Ayodhya Ram Mandir में कथित चढ़ावा चोरी के मामला इन दिनों सुर्खियों में बना हुआ है। राम मंदिर में कथित चंदा चोरी मामला (Ram Mandir Donation Row) सामने आने के बाद पूरा देश एक ही सवाल पूछ रहा है। वह यह कि ऐसा क्या किया जाए कि भगवान की आरती की थाली से निकला चढ़ावा किसी निजी तिजोरी तक न पहुंचे? करोड़ों श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ मंदिरों में दान करते हैं। यह सिर्फ दान नहीं होता, बल्कि अपने अराध्य के प्रति उनके समर्पण, आस्था और विश्वास का भी प्रतीक होता है। ऐसे में यदि उस धन की सुरक्षा और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं तो सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक आस्था को भी ठेस पहुंचती है और मंदिरों के रखरखाव से जुड़े तंत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगते हैं। इस विषय पर हमने राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ ही धार्मिक विशेषज्ञों से भी बात की। इस बातचीत में उन्होंने अपने जो सुझाव दिए, वह हम आपके साथ साझा कर रहे हैं। उनके यह सुझाव भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने का आधार बन सकते हैं।
राजनीति से दूर हो मंदिर प्रबंधन : प्रभाकर जी
झारखंड में देवघर बाबा धाम के पुजारी प्रभाकर जी का मानना है कि मंदिरों के ट्रस्ट और प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप सबसे बड़ी समस्या बन सकता है। उनके अनुसार, मंदिरों का संचालन धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए। हमसे बातचीत में उन्होंने कहा कि ट्रस्ट में राजनीतिक लोगों को लाने से हितों का टकराव पैदा होता है। ऐसे पदों पर संत, महंत और धार्मिक परंपराओं को समझने वाले लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। प्रभाकर जी का सुझाव है कि चारों शंकराचार्यों और धार्मिक विद्वानों की राय के अनुरूप मंदिरों की प्रशासनिक व्यवस्था तैयार होनी चाहिए।
टाइम्स नाउ नवभारत का कैंपेन - चढ़ावे का हिसाब दो
पुजारी प्रभाकर जी का यह सुझाव धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर जोर देता है। हालांकि, बड़े मंदिरों के वित्तीय और प्रशासनिक संचालन के लिए आधुनिक प्रबंधन और वित्तीय विशेषज्ञता भी उतना ही जरूरी है। इसलिए धार्मिक नेतृत्व और पेशेवर प्रशासन का संतुलित मॉडल बड़े मंदिरों में ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
CCTV से लेकर बैंक तक पूरी निगरानी हो : पवन पांडे
समाजवादी पार्टी के नेता और अयोध्या के पूर्व विधायक तेज नारायण पांडे (पवन पांडे) का कहना है कि दान पूरी तरह उस मंदिर में श्रद्धा रखने वाले भक्तों की आस्था का विषय है, इसलिए इसकी सुरक्षा मंदिर प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि दानपात्र खुलने से लेकर नकदी बैंक में जमा होने तक पूरी प्रक्रिया CCTV कैमरों की निगरानी में हो। उनका कहना है कि दान की गिनती करने वाले कर्मचारी जब इस कार्य के लिए आएं तो उनके कपड़ों में जेब तक नहीं होनी चाहिए, ताकि किसी तरह की हेराफेरी की संभावना खत्म हो सके।
राज्य में 2012 से 2017 तक पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार के दौरान मंत्री रहे पवन पांडे का यह सुझाव काफी व्यावहारिक है। कई मंदिर ट्रस्ट और मंदिर प्रशासन इस तरह की 'क्लोज्ड मॉनिटरिंग' व्यवस्था अपनाते हैं। इसके बावजूद कथित चंदा चोरी जैसी घटनाएं हो जाती हैं। अगर सभी मंदिरों में भी ऐसी व्यवस्था लागू हो जाए तो पारदर्शिता और बढ़ जाएगी। ऐसे में श्रद्धालुओं के अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान को जो चंदा अर्पित किया है, वह किसी की निजी तिजोरी में जाने की बजाय मंदिर के विकास और धर्माथ कार्यों पर खर्च होगा।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें - राम मंदिर चंदा विवाद के बीच क्यों हो रही तिरुपति मॉडल की चर्चा? आखिर क्या है हर पाई का हिसाब रखने का फॉर्मूला?
सिर्फ तकनीक नहीं, चरित्र की भी जांच हो
भविष्य में कथित चंदा चोरी जैसी घटाओं को रोकने के उपायों पर पवन पांडे का कहना है कि सिर्फ कैमरे लगाने से समस्या खत्म नहीं होगी। जिन भी लोगों को दान प्रबंधन की जिम्मेदारी दी जाए, उनके चाल-चरित्र और बैकग्राउंड की भी अच्छे से जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही स्वतंत्र निष्पक्ष निगरानी टीम बनाई जाए, जो समय-समय पर पूरी व्यवस्था का ऑडिट करे। पूर्व विधायक का यह सुझाव भी काफी व्यवसहारिक है, क्योंकि अन्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि किसी भी वित्तीय व्यवस्था में 'फोर आई प्रिंसिपल' यानी एक से अधिक स्तर की निगरानी भ्रष्टाचार की संभावना कम करने में मददगार होती है। इंडिपेंडेंट ऑडिट और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन इस दिशा में प्रभावी कदम साबित हो सकते हैं।
कांग्रेस ने ट्रस्ट की संरचना पर उठाए सवाल
इस विषय पर हमने उत्तर प्रदेश यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष शरद शुक्ला से भी बात की। इस पर उनका कहना है कि राम मंदिर मंदिर ट्रस्ट के गठन में संत समाज, कारसेवकों और धार्मिक प्रतिनिधियों की पर्याप्त भागीदारी नहीं रही। उनके मुताबिक, ट्रस्ट में धार्मिक नेतृत्व के साथ पूर्व न्यायाधीश, वित्तीय जानकार और समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में जिन लोगों पर आरोप लग रहे हैं, वे पारंपरिक संत या महंत नहीं हैं। उनका कहना है कि पूज्य धार्मिक व्यक्तियों पर ऐसे आरोप कम ही देखने को मिलते हैं।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें - भारत के 6 सबसे अमीर मंदिर, करोड़ों में आता है चढ़ावा, अद्धी कुर्ता और बिना नाड़े का पायजामा पहन होती है नोटों की गिनती!
ऑनलाइन दान भी समाधान नहीं
एक तर्क ये आता है कि कैश दान की व्यवस्था को खत्म करके ऑनलाइन (QR Code) किया जाए तो इससे अधिक पारदर्शिता आएगी। लेकिन शरद शुक्ला का कहना है कि सिर्फ इस कदम से पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं हो सकती। यदि फंड के उपयोग की निगरानी नहीं होगी तो दुरुपयोग की आशंका हमेशा बनी रहेगी। उन्होंने श्रद्धालुओं से दान में मिले आभूषणों के वजन, शुद्धता और रिकॉर्ड की दैनिक जांच तथा पूरे देश के बड़े मंदिरों में समान व्यवस्था लागू करने की भी वकालत की है।
कथित चंदा चोरी मामले में क्या बड़ी मछली पकड़ी जाएगी?
इस प्रश्न पर समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा कि यदि सरकार दोषियों को बचाने की कोशिश करेगी तो जनता सब समझती है और लोकतांत्रिक तरीके से उनके इस कृत्य का जवाब भी देगी। यह भी सच है कि किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आता है। इसलिए बड़े या छोटे किसी भी आरोपी की जिम्मेदारी कानूनी जांच के आधार पर ही तय होनी चाहिए।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें - 'रामलला सबके हैं, दोषियों को बख्शा न जाए'; राम मंदिर में चोरी से आहत हुए इकबाल अंसारी
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता शरद शुक्ला कहते हैं कि आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई है तो यह मानना मुश्किल है कि इस मामले की जानकारी सीनियर पदाधिकारियों को न हो। उन्होंने सभी जिम्मेदार लोगों पर निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
कथित चंदा चोरी की घटनाएं न हों, इसका स्थायी समाधान क्या हो?
राजनीतिक और धार्मिक जानकारों की राय मिलाकर देखें तो कुछ बिंदुओं पर व्यापक सहमति दिखाई देती है। जैसे दानपात्र से बैंक तक पूरी CCTV निगरानी हो, इंडिपेंडेंट ऑडिट हो, ट्रस्ट की जवाबदेही तय हो, पात्र कर्मचारियों का वैरिफिकेशन हो, आभूषणों और नकदी का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए, नियमित सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्ट के साथ ही धार्मिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों की संयुक्त भागीदारी सुनिश्चित की जाए। किसी भी धार्मिक संस्था में आस्था तभी मजबूत होती है जब श्रद्धालुओं को विश्वास हो कि भगवान के चरणों में अर्पित उनकी पाई-पाई का हिसाब रखा जाएगा और उस चढ़ावे को पूरी ईमानदारी से अच्छे उद्देश्य के लिए खर्च किया जाएगा।