Himachal Pradesh CM Name: लंबे समय से सियासी सूखे की मार झेल रही कांग्रेस के लिए हिमाचल की जीत संजीवनी का काम कर रही है। पार्टी ने 40 सीटों पर जीत हासिल की है। जबकि बीजेपी 25 सीटें ही जीत सकी। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री चुनने की है।
अभी क्या चल रहा है
हिमाचल में मुख्यमंत्री चुनने को लेकर कांग्रेस विधायक दल की बैठक शुरू हो चुकी है। केंद्रीय नेतृत्व की तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भेजा गया है। प्रभारी राजीव शुक्ला भी बैठक में मौजूद है। सूत्रों के मुताबिक बैठक में एक लाइन का प्रस्ताव पास किया जाएगा। जिसमे कांग्रेस हाई कमान को अगला मुख्यमंत्री चुनने के लिए अधिकृत कर दिया जाएगा। जानकारी ये भी है की आज शाम तक अगले मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान कर दिया जाएगा। आज ही कांग्रेस पार्टी राज्यपाल से मिलने का वक्त मांग सकती है।
रेस में ये नाम शामिल
हिमाचल में मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस के कई उम्मीदवार रेस में है। कुछ ऐसे भी नेता है जो मुख्यमंत्री पद की रेस में तो थे लेकिन चुनाव ही हार गए। इसमें दो नेता आशा कुमारी और ठाकुर कॉल सिंह है। अब जो बचे है इसमें सुखविंदर सिंह सुक्खू, मुकेश अग्निहोत्री, सुधीर शर्मा,कुलदीप सिंह राठौड़ प्रमुख है। प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह भी रेस में हैं। लेकिन वो प्रदेश अध्यक्ष के साथ साथ हाल ही में हुए उपचुनाव में सांसद चुन कर आई है। इसलिए पार्टी का एक तबका उनके मुख्यमंत्री बनने की मुखालफत कर रहे हैं। ऐसे में हिमाचल का अगला मुख्यमंत्री ठाकुर या ब्राह्मण में से कोई एक बन सकता है।
कौन किसका कर रहा समर्थन
पंजाब और राजस्थान के सियासी संकट से सिख लेते हुए कांग्रेस आलाकमान कोई भी एकतरफा फैसला नहीं करना चाहता। इस बार नेतृत्व कोई भी फैसला स्थानीय नेताओं से सलाह कर के ही करेगा। दिल्ली से कोई भी फैसला थोपा नही जायेगा। हालांकि जानकारी के मुताबिक 40 में से लगभग 18 विधायक सुक्खू के समर्थक माने जा रहे हैं। ऐसे में उनकी दावेदारी दूसरो से ज्यादा मजबूत माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक अगर सुक्खू मुख्यमंत्री बनते है तो प्रतिभा सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह को उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है।
पार्टी को टूट से बचाना बड़ी चुनौती
बहरहाल हिमाचल का चुनाव जीत चुकी कांग्रेस को न सिर्फ अपना कुनबा टूटने से बचते रखना है बल्कि हिमाचल की जनता से किए वादे को लागू भी करना है। ऐसे में एक गलत फैसला न सिर्फ वहा की सरकार को खतरे में डाल सकती है, बल्कि पार्टी में टूट की संभावना बढ़ा सकती है।
