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'बिना पेनिट्रेशन रेप नहीं, सिर्फ रेप की कोशिश', छत्तीसगढ़ HC का बड़ा फैसला, आरोपी की सजा घटाकर आधी की

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने 16 फरवरी के आदेश में कहा, 'इस अदालत ने माना कि दुष्कर्म सिद्ध करने के लिए 'पेनिट्रेशन’का प्रमाण आवश्यक है, भले ही वह आंशिक ही क्यों न हो। प्रस्तुत मामले में उपलब्ध साक्ष्यों से पूर्ण बलात्कार सिद्ध नहीं होता, लेकिन आरोपी द्वारा बलात्कार का प्रयास किया जाना अवश्य सिद्ध होता है।’धमतरी जिले की निवासी पीड़िता 21 मई 2004 को जब घर पर अकेली थी।

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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय।

Photo : PTI

Chhattisgarh HC verdict : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में बुधवार को कहा कि 'अगर घटना के दौरान पेनिट्रेशन नहीं हुआ तो इसे रेप नहीं, बल्कि रेप की कोशिश माना जाएगा।' बीते सोमवार को यह फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने आरोपी की सात साल की सजा घटाकर साढ़े तीन साल कर दी। अपने इस फैसले से पहले कोर्ट ने पीड़िता के मेडिकल रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने एक अपील में यह निर्णय पारित किया।

कोर्ट ने सजा घटाकर तीन वर्ष छह माह की

उच्च न्यायालय ने आरोपी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी सजा घटाकर तीन वर्ष छह माह का कठोर कारावास करने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता वासुदेव गोंड ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, धमतरी (कैम्प-रायपुर) द्वारा छह अप्रैल 2005 को पारित उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और धारा 342 के तहत छह माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

2004 की है घटना

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने 16 फरवरी के आदेश में कहा, 'इस अदालत ने माना कि दुष्कर्म सिद्ध करने के लिए 'पेनिट्रेशन’का प्रमाण आवश्यक है, भले ही वह आंशिक ही क्यों न हो। प्रस्तुत मामले में उपलब्ध साक्ष्यों से पूर्ण बलात्कार सिद्ध नहीं होता, लेकिन आरोपी द्वारा बलात्कार का प्रयास किया जाना अवश्य सिद्ध होता है।’धमतरी जिले की निवासी पीड़िता 21 मई 2004 को जब घर पर अकेली थी तब आरोपी उसे बहाने से अपने घर ले गया और उससे कथित तौर पर दुष्कर्म किया। बाद में उसे कमरे में बंद कर उसके हाथ-पैर बांध दिए। इस घटना के संबंध में थाना अर्जुनी में मामला दर्ज कराया गया।

'पेनिट्रेशन’ को लेकर स्पष्टता नहीं -कोर्ट

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने 19 गवाहों से सवाल जवाब किये। पीड़िता ने अपने बयान में आरोपी द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने की बात कही, हालांकि जिरह में उसने 'पेनिट्रेशन’ को लेकर विरोधाभासी बयान दिया। उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद 21 जनवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे 16 फरवरी को सुनाया गया। फैसले के अनुसार उच्च न्यायालय ने पूरे मामले में साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि पीड़िता के बयान में 'पेनिट्रेशन’ को लेकर स्पष्टता नहीं है। न्यायालय ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से दुष्कर्म सिद्ध नहीं होता, लेकिन आरोपी द्वारा दुष्कर्म का प्रयास किया जाना जरूर सिद्ध होता है।

दोषी पर दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी

उच्च न्यायालय ने गोंड को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) और 511 के तहत दोषी ठहराया, न कि केवल धारा 376 के तहत, और उसे तीन साल छह महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही, धारा 342 के तहत छह महीने की सजा भी बरकरार रखी गई। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि आरोपी द्वारा पूर्व में काटी गई सजा का समायोजन किया जाएगा। अदालत ने आरोपी की जमानत रद्द कर दी और उसे निर्देश दिया कि वह दो माह के भीतर अधीनस्थ अदालत में आत्मसमर्पण करे, वरना उसकी गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई की जाएगी।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

Alok Rao
आलोक कुमार रावauthor

19 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय आलोक राव ने प्रिंट, न्यूज एजेंसी, टीवी और डिजिटल चारों ही माध्यमों में काम किया है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें समाचारों की समझ, प्रेजेंटेशन, डिटेलिंग और न्यूजरूम डायनेमिक्स में असाधारण दक्षता प्रदान की है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखने के साथ-साथ जियो-पॉलिटिक्स एवं डिफेंस की स्टोरीज में इनकी खासी दिलचस्पी है। आलोक ने अलग-अलग माध्यमों में काम करते हुए समाचारों की समझ, प्रस्तुति और विश्लेषण में मजबूत दक्षता विकसित की है और अब तक 25,000 से अधिक आर्टिकल तैयार कर चुके हैं। तथ्यों की गहन जांच, मजबूत न्यूज सेंस और तेज निर्णय क्षमता उनकी पत्रकारिता की प्रमुख खासियतें हैं।

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