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टेलीग्राम अस्थायी बैन मामला: हाईकोर्ट में फैसला सुरक्षित; सरकार बोली- आतंकी गतिविधियों का अड्डा बन गया है प्लेटफॉर्म

नीट पेपर लीक को लेकर केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम को लेकर आरोपों की लंबी सूची रखी है। इसमें सरकार ने दावा किया कि इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आतंकवाद, साइबर अपराध, पेपर लीक और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार में इस्तेमाल हो रहा है।

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दिल्ली हाईकोर्ट। फाइल फोटो

पेपर लीक के बाद दोबारा होने जा रही NEET-UG परीक्षा से पहले टेलीग्राम प्लेटफॉर्म पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने सभी पक्षों को शाम 7 बजे तक अपने लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और टेलीग्राम के बीच तीखी कानूनी बहस देखने को मिली। केंद्र सरकार ने परीक्षा की निष्पक्षता, छात्रों की चिंता और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए अपने फैसले का बचाव किया, जबकि टेलीग्राम ने पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने की कार्रवाई को असंगत और कानून के विपरीत बताया।

केंद्र का पक्ष: करोड़ों छात्रों की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि देशभर में करोड़ों छात्र NEET-UG परीक्षा से जुड़े हुए हैं और सरकार उनकी आशंकाओं को समझती है। उन्होंने कहा कि यदि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक जैसी कोई घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।

केंद्र ने दलील दी कि ऐसी घटनाओं से न केवल परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता प्रभावित होती है बल्कि कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ सकती है। सरकार का कहना था कि अनुपातिकता के प्रश्न पर न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए और प्रशासनिक आकलन को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।

'NEET Mafia' चैनल का भी दिया उदाहरण

केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि टेलीग्राम पर कथित तौर पर 'NEET Mafia' नाम का एक चैनल संचालित हो रहा है, जिसके लगभग 18 हजार सब्सक्राइबर हैं। सरकार ने कहा कि इस प्रकार के चैनल बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच बनाकर परीक्षा संबंधी संवेदनशील और संभावित रूप से अवैध सामग्री का प्रसार कर सकते हैं। केंद्र के अनुसार यही वजह है कि प्लेटफॉर्म के संचालन और निगरानी को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं।

टेलीग्राम पर दुरुपयोग रोकने में विफल रहने का आरोप

सुनवाई के दौरान केंद्र ने यह भी बताया कि सरकार और टेलीग्राम के प्रतिनिधियों के बीच पहले बैठक हो चुकी थी। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकारियों ने कंपनी को अवगत कराया था कि अवैध सामग्री के प्रसार की समस्या नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।

सरकार का आरोप है कि पिछले चार वर्षों से टेलीग्राम अपने सर्च फीचर की सीमाओं और तकनीकी चुनौतियों का हवाला देता रहा है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। केंद्र ने यह भी बताया कि कंपनी को आईएमईआई स्तर पर ब्लॉकिंग और हैश-आधारित पहचान प्रणाली जैसे उपायों पर विचार करने की सलाह दी गई थी। हालांकि टेलीग्राम ने कहा कि उसके पास आईएमईआई आधारित पहचान से जुड़े आवश्यक तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं हैं।

टेलीग्राम की दलील: पूरे प्लेटफॉर्म पर रोक अनुचित

टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने अदालत में कहा कि यदि कोई आपत्तिजनक या अवैध सामग्री है तो उसे हटाया या ब्लॉक किया जा सकता है, लेकिन पूरे प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है। टेलीग्राम ने तर्क दिया कि प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बड़ी संख्या में वैध गतिविधियों के लिए भी किया जाता है। कंपनी का कहना था कि यह मामला किसी आपातकालीन स्थिति का नहीं था और सरकार के आदेश में कानूनी खामियां हैं।कंपनी ने यह भी कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत उपलब्ध शक्तियों का प्रयोग सीमित और उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए।

हाईकोर्ट के अहम सवाल

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सामने मुख्य प्रश्न यह है कि क्या कथित समस्या से निपटने के लिए पूरे ऐप पर प्रतिबंध लगाने जैसा व्यापक कदम उठाया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि कानून में ऐसी शक्ति मौजूद है और उसका प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।

कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड पर दर्ज किया कि टेलीग्राम का कहना है कि यह आपातकालीन स्थिति का मामला नहीं था और यदि कोई आपत्तिजनक सामग्री थी तो उसे ब्लॉक किया जा सकता था, पूरे प्लेटफॉर्म को नहीं।

रियल टाइम निगरानी पर भी सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट ने टेलीग्राम से पूछा कि यदि किसी परीक्षा के प्रश्नपत्र के लीक होने जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न होती है तो उसके पास अवैध सामग्री के प्रसार को तत्काल रोकने के लिए क्या व्यवस्था है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि प्लेटफॉर्म पर रियल टाइम निगरानी और प्रभावी मॉडरेशन को लेकर कंपनी का क्या प्रस्ताव है।

दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब अदालत का निर्णय यह तय करेगा कि परीक्षा सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत सरकार की शक्तियों की सीमा क्या होगी।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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