आईएएस, आईपीएस और आईएफओएस अधिकारियों के लिए नई कैडर नीति लागू, जानें क्या-क्या होंगे बदलाव
- Edited by: शिव शुक्ला
- Updated Jan 24, 2026, 11:55 PM IST
केंद्र सरकार ने आईएएस, आईपीएस, आईएफओएस अधिकारियों के लिए कैडर आवंटन नीति में बदलाव किया है। अखिल भारतीय सेवाओं के तहत आने वाले कैडर या संयुक्त कैडर का मतलब उन राज्यों, राज्यों के समूह या केंद्र शासित प्रदेशों से होता है, जहां इन तीनों सेवाओं के अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं।
सिविल सेवकों के लिए नई कैडर नीति लागू
केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय सेवाओं से जुड़े सिविल सेवकों के लिए एक अहम प्रशासनिक सुधार लागू किया है। इस फैसले के तहत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफओएस) के अधिकारियों के कैडर आवंटन की व्यवस्था में व्यापक बदलाव किए गए हैं। नई नीति का उद्देश्य कैडर आवंटन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, संतुलित और सुव्यवस्थित बनाना बताया जा रहा है। इसमें उनकी तैनाती के लिए नए समूह समेत अन्य प्रावधान भी शामिल हैं।
हाल ही में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार अब संबंधित मंत्रालय हर वर्ष 1 जनवरी तक कैडर में मौजूद अंतर (कैडर गैप) के आधार पर रिक्त पदों का आकलन करेंगे। इसी आकलन के आधार पर अधिकारियों की तैनाती और आवंटन किया जाएगा। इससे पहले यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल और कई स्तरों पर निर्भर मानी जाती थी, जिसे लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं।
नई नीति से क्या बदल जाएगा?
अखिल भारतीय सेवाओं के तहत आने वाले कैडर या संयुक्त कैडर का मतलब उन राज्यों, राज्यों के समूह या केंद्र शासित प्रदेशों से होता है, जहां इन तीनों सेवाओं के अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। अब तक कैडर आवंटन के लिए देश को पांच भौगोलिक क्षेत्रों में बांटा गया था, लेकिन नई नीति के तहत इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। इसके स्थान पर सभी राज्य कैडरों और संयुक्त कैडरों को अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में व्यवस्थित करते हुए चार नए समूह बनाए गए हैं।
केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय द्वारा 23 जनवरी को जारी नई व्यवस्था के अनुसार पहले समूह में अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेशों का संयुक्त कैडर (एजीएमयूटी), आंध्र प्रदेश, असम-मेघालय, बिहार और छत्तीसगढ़ को शामिल किया गया है। दूसरे समूह में गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल और मध्य प्रदेश को रखा गया है।
तीसरे समूह में महाराष्ट्र, मणिपुर, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम और तमिलनाडु को शामिल किया गया है। वहीं चौथे और अंतिम समूह में तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल को रखा गया है।
नई नीति में और क्या-क्या?
कैडर नियंत्रण प्राधिकार अर्थात् कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) / गृह मंत्रालय (एमएचए) / पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ एंड सीसी), प्रत्येक कैडर के लिए अनारक्षित (यूआर) / अनुसूचित जाति (एससी) / अनुसूचित जनजाति (एसटी) / अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) / आंतरिक / बाहरी रिक्तियों सहित रिक्तियों का निर्धारण करेंगे। कैडर-वार/श्रेणी-वार रिक्तियों का निर्धारण परीक्षा वर्ष के बाद वाले वर्ष की एक जनवरी को मौजूद कैडर अंतर के आधार पर किया जाएगा। आईएएस, आईपीएस और आईएफओएस अधिकारियों का चयन तीन चरणों वाली सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से किया जाता है।
राज्य सरकारें किसी विशेष सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई)/भारतीय वन सेवा परीक्षा के माध्यम से भरी जाने वाली रिक्तियों की कुल संख्या परीक्षा वर्ष के बाद वाले वर्ष की 31 जनवरी तक सूचित करेंगी। अपने-अपने अधीन सेवाओं के संबंध में संबंधित कैडर-नियंत्रक प्राधिकरण कैडर में मौजूद ‘कैडर अंतराल’, राज्य सरकारों से प्राप्त मांग और कैडर में रोस्टर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए विभिन्न श्रेणियों (जैसे यूआर/एससी/एसटी/ओबीसी) के अनुसार रिक्तियों का निर्धारण करेंगे।
इसमें कहा गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए भर्ती को लेकर आरक्षित रिक्तियों को केवल शहरी क्षेत्र की रिक्तियों का हिस्सा माना जाएगा। इस प्रकार निर्धारित रिक्तियों की जानकारी राज्य सरकारों को दी जाएगी और संबंधित मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रकाशित की जाएगी।
नीति में कहा गया है कि दोनों कार्रवाइयां सिविल सेवा परीक्षा/भारतीय वन सेवा परीक्षा के अंतिम परिणाम की घोषणा से पहले पूरी कर ली जानी चाहिए, जिसके आधार पर भर्ती की जानी है। चूंकि यह एक समयबद्ध प्रक्रिया होगी, इसलिए केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित समय सीमा के बाद राज्य सरकारों से प्राप्त अनुरोधों पर रिक्तियों का निर्धारण करते समय विचार नहीं किया जाएगा, इसमें स्पष्ट किया गया है।
सरकार का मानना है कि इस नई कैडर नीति से अधिकारियों को विभिन्न क्षेत्रों में काम करने का अधिक संतुलित अवसर मिलेगा और राज्यों में प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर वितरण सुनिश्चित हो सकेगा। साथ ही, कैडर प्रबंधन में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को भी कम किया जा सकेगा। प्रशासनिक सुधारों की इस कड़ी को केंद्र सरकार की एक और बड़ी पहल के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों में सिविल सेवाओं की कार्यप्रणाली पर साफ तौर पर नजर आ सकता है।
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