Culcutta High Court: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों के दौरान चुनाव चिह्न आवंटन को लेकर भारतीय चुनाव आयोग (EC) के रुख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) द्वारा चुनाव चिह्न 'लिफाफा' (Envelope) छीनकर एक नए राजनीतिक दल डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस (DTC) को आवंटित करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। जस्टिस कृष्णा राव की एकल पीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या इस आवंटन में आयोग और नई नवेली पार्टी के बीच कोई सांठगांठ थी, और स्पष्ट किया कि अदालत के समक्ष संवैधानिक अधिकारियों को निष्पक्ष होना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर 2026 को उपचुनाव होने हैं। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने तर्क दिया कि उसने 2024 के लोकसभा चुनाव और 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 'लिफाफा' (Envelope) सिंबल के तहत ही चुनाव लड़ा था। ISF ने उपचुनाव के लिए भी इसी चुनाव चिह्न के लिए आवेदन किया था, लेकिन चुनाव आयोग ने 18 सितंबर को इसे बदलकर डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस (DTC) को आवंटित कर दिया और ISF को 'अलमारी' सिंबल थमा दिया।
अदालत में चुनौती
वरिष्ठ अधिवक्ता बिकेश रंजन भट्टाचार्य के माध्यम से दायर याचिका में ISF ने चुनाव आयोग के इस फैसले को गैर-कानूनी, मनमाना और तानाशाही करार दिया। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणियां कीं। सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने देखा कि सुनवाई के समय चुनाव आयोग और प्राइवेट प्रतिवादी (DTC) के वकीलों का आचरण एक-दूसरे को प्रेरित करता नजर आ रहा था।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी की, अगर चुनाव आयोग को किसी निजी प्रतिवादी द्वारा निर्देशित किया जा रहा है, तो फिर क्या बचता है? आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके वकील को अदालत के सभी सवालों के जवाब खुद देने चाहिए, न कि किसी अन्य पार्टी के वकील की सहायता लेनी चाहिए।
चुनाव आयोग का विवेकाधिकार निरंकुश नहीं
ISF के वकील बिकेश रंजन भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि चुनाव चिह्न का आवंटन आयोग के विवेकाधिकार में जरूर आता है, लेकिन इसका उपयोग तर्कसंगत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विवेकाधिकार का प्रयोग किसी निरंकुश शासक की तरह नहीं किया जा सकता। जस्टिस राव ने कहा कि भले ही ISF के पास 'लिफाफा' सिंबल का कोई अंतिम कानूनी अधिकार न हो और उसके आवेदन को खारिज किया जा सकता था, लेकिन अस्वीकृति का एक स्पष्ट और तर्कसंगत कारण होना चाहिए था।
चुनाव आयोग (EC) की दलीलें- चुनाव आयोग के वकील जिष्णु चौधरी ने अदालत में आयोग के फैसले का बचाव करते हुए ये तर्क प्रस्तुत किए-
मुफ्त प्रतीक का नियम
चुनाव संपन्न होने और 4 मई को परिणाम घोषित होने के बाद गैर-मान्यता प्राप्त दलों को आवंटित किए गए सिंबल 'फ्री सिंबल' बन जाते हैं, जिन्हें आयोग नियमानुसार किसी को भी आवंटित कर सकता है।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) में विभाजन
आयोग ने बताया कि 17 सितंबर को तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद उसका आरक्षित प्रतीक 'फूल और घास' फ्रीज कर दिया गया था। दोनों गुटों—ममता तृणमूल कांग्रेस और डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस (DTC) के प्रत्याशियों का नामांकन खारिज होने से बचाने के लिए आयोग ने 18 सितंबर को विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन्हें सिंबल आवंटित किए।
चुनाव रोकने की कोशिश का आरोप
आयोग ने दावा किया कि ISF पहले ही नंदीग्राम में अपने नए सिंबल 'अलमारी' के साथ प्रचार शुरू कर चुकी है और इस याचिका का मकसद 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव को टालना है।
उपचुनाव टालने के लिए याचिका
ISF के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए मांग की कि न्याय के हित में नंदीग्राम उपचुनाव को स्थगित किया जाए, जिससे कोई संवैधानिक संकट पैदा नहीं होगा। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि नामांकन, जांच और नाम वापसी की समय सीमा समाप्त हो जाने के बाद, जब चुनाव प्रक्रिया इतनी आगे बढ़ चुकी है, तब हाईकोर्ट इसमें किस हद तक हस्तक्षेप कर सकता है। हाईकोर्ट ने आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया कि वह ऐसे कदम उठाए जिससे भविष्य में मुकदमेबाजी का बोझ अदालतों पर न पड़े।
