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World Parkinsons Day: पार्किंसंस को सिर्फ हाथ कांपना समझना भूल, कई संकेत देती है यह बीमारी, जल्दी ऐसे पहचानें

World Parkinsons Day: आमतौर लोग पार्किंसंस को सिर्फ हाथ कांपने की बीमारी समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। इसके कई लक्षण और दुष्प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। डॉक्टर से जानें ये अनदेखे लक्षण..

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पार्किंसंस रोग के अनदेखे लक्षण

World Parkinsons Day: हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हाथ कांप रहे हैं तभी पार्किंसंस की चिंता करनी चाहिए, लेकिन सच इससे थोड़ा अलग है। यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर में बदलाव लाती है, जिन पर शुरुआत में ज्यादा ध्यान नहीं जाता। कई लोग इसे कमजोरी, थकान या बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। अमृता अस्पताल फरीदाबाद के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. संजय पांडे बताते हैं कि अगर शुरुआती संकेतों को समझ लिया जाए तो समय पर इलाज से इस बीमारी को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है और व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है।

पार्किंसंस क्या है और शरीर पर कैसे असर डालता है?

पार्किंसंस एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, यानी यह हमारे दिमाग और नसों से जुड़ी होती है। इस स्थिति में दिमाग में बनने वाला डोपामिन नाम का केमिकल धीरे-धीरे कम होने लगता है। यही केमिकल शरीर की मूवमेंट को स्मूद बनाए रखने में मदद करता है। जब इसकी मात्रा घटती है, तो चलने-फिरने, संतुलन बनाने और छोटे-छोटे काम करने में परेशानी महसूस हो सकती है। यही वजह है कि मरीज को रोजमर्रा के काम भी पहले से मुश्किल लगने लगते हैं।

ये छोटे बदलाव भी हो सकते हैं संकेत (Parkinsons Symptoms)

ज्यादातर लोग पार्किंसंस को सिर्फ हाथ कांपने से जोड़ते हैं, जबकि कई बार शुरुआत में हाथ नहीं कांपते, बल्कि शरीर की गति धीमी हो जाती है। जैसे चलते समय कदम छोटे हो जाना, काम करने में ज्यादा समय लगना या लिखावट का पहले से छोटा हो जाना। कुछ लोगों को मांसपेशियों में जकड़न महसूस होती है या आवाज पहले से धीमी लगने लगती है। चेहरे के हाव-भाव कम दिखना भी इसका संकेत हो सकता है। ये बदलाव धीरे-धीरे होते हैं, इसलिए लोग इन्हें सामान्य समझकर टाल देते हैं।

कुछ लक्षण जिन्हें लोग आम समस्या मान लेते हैं

पार्किंसंस के कुछ संकेत ऐसे होते हैं, जो सीधे मूवमेंट से जुड़े नहीं होते। जैसे सूंघने की क्षमता कम होना, कब्ज रहना, नींद ठीक से न आना या बार-बार मूड खराब रहना। कई मरीजों में डिप्रेशन या एंग्जायटी भी देखी जाती है। भारत में हुए अध्ययनों में पाया गया है कि आधे से ज्यादा मरीजों को मानसिक रूप से भी परेशानी महसूस होती है। इसलिए इस बीमारी को सिर्फ शारीरिक समस्या मानना सही नहीं है।

सही इलाज और थेरेपी से बेहतर हो सकती है लाइफ

आज के समय में पार्किंसंस को मैनेज करने के कई अच्छे विकल्प मौजूद हैं। डॉक्टर की सलाह से दवाइयों के जरिए लक्षणों को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। इसके अलावा फिजियोथेरेपी और नियमित एक्सरसाइज शरीर को एक्टिव बनाए रखने में मदद करती है। स्पीच थेरेपी से आवाज और बोलने में सुधार हो सकता है। कुछ मामलों में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) जैसी एडवांस तकनीक भी मददगार होती है। यानी इलाज सिर्फ दवा तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी लाइफस्टाइल को बेहतर बनाने पर फोकस किया जाता है।

समय पर पहचान से मिल सकता है बेहतर रिजल्ट

पार्किंसंस धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, इसलिए इसकी शुरुआती पहचान बहुत मायने रखती है। अगर शुरुआत में ही लक्षणों को समझकर न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह ली जाए, तो बीमारी की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। सही इलाज, नियमित एक्सरसाइज और परिवार के सपोर्ट से मरीज लंबे समय तक एक्टिव और स्वतंत्र जीवन जी सकता है।

डॉक्टर की सलाह

डॉ. संजय पांडे पार्किंसंस का मतलब यह नहीं कि जिंदगी रुक जाएगी। जरूरत है सही जानकारी और जागरूकता की। अगर शरीर में कोई छोटा बदलाव लंबे समय तक महसूस हो रहा है, तो उसे नजरअंदाज न करें। समय पर सलाह लेना ही सबसे अच्छा कदम हो सकता है, क्योंकि जल्दी पहचान से इलाज ज्यादा असरदार साबित होता है।

Vineet
विनीतauthor

विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर गहरी समझ है। इन्होंने हेल्थ, फिटनेस, न्यूट्रिशन और सप्लीमेंट के फील्ड में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन भी किए हैं। वे 6 साल से इस फील्ड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर 7,000 से अधिक लेख लिख चुके हैं। विनीत की खासियत उनकी रिसर्च-बेस्ड लेखन शैली और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिखी गई जानकारीपूर्ण स्टोरीज हैं।

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