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इमोशंस के बवंडर में नहीं होगा ब्लंडर, मेंटल हेल्थ ऐप्स से ऐसे समझें अपनी भावनाएं

Mental Health Apps: छोटी बात पर मन क्यों उलझ जाता है और बार-बार एक जैसे विचार क्यों आते हैं? जानें मानसिक स्वास्थ्य ऐप्स अपनी सोच, भावनाओं और व्यवहार को समझने में कैसे मदद कर सकते हैं।

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मूड बदलता है, वजह समझ नहीं आती- ऐप्स और काउंसलिंग से अपने मन को कैसे समझें (AI Image)

Mental Health Apps: कभी किसी से हुई छोटी-सी बातचीत घंटों दिमाग में घूमती रहती है। सामने वाला अपनी बात कहकर आगे बढ़ जाता है, लेकिन आप उसके अलग-अलग मतलब निकालते रहते हैं। कभी दिनभर काम संभालने के बाद घर पहुंचते ही मामूली बात पर गुस्सा आ जाता है। फिर कुछ देर बाद खुद से सवाल करते हैं कि मैंने इतनी तेज प्रतिक्रिया क्यों दी? बेशक अपनी भावनाओं को महसूस करना आसान है लेकिन उनकी वजह समझना कई बार मुश्किल होता है।

इस मुश्किल को हम अक्सर एक वाक्य में समेट देते हैं- मैं बहुत सोचती हूं, मुझे जल्दी गुस्सा आता है या मेरा स्वभाव ही ऐसा है। लेकिन इन बातों से आगे बढ़कर देखें तो कुछ जरूरी सवाल सामने आते हैं। उस दिन आपके साथ क्या हुआ था? क्या आप पहले से थके हुए थे? क्या किसी बात से चोट पहुंची थी, जिसे उस समय कह नहीं पाए? अपने अनुभवों को समझने की शुरुआत ऐसे ही सवालों से होती है।

अब कुछ ऐप्स इस बातचीत में मदद देने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें मूड दर्ज करने, रोज के अनुभव लिखने और तनाव या व्यवहार से जुड़े सवालों के जवाब देने जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। इसके आकलन मनोवैज्ञानिकों ने तैयार किए हैं और रिपोर्टों की पेशेवर समीक्षा की जाती है। हालांकि, किसी ऐप की सुविधाओं और उसके प्रभावी होने के प्रमाण को अलग-अलग देखना जरूरी है।

ऐसी ही एक AI एप SynqSol के संस्थापक वेंकट राव का कहना है कि आज लोगों के पास पहले से ज्यादा जानकारी और विकल्प हैं, फिर भी फैसले लेना आसान नहीं हुआ है। उनके अनुसार, बड़े निर्णयों से पहले व्यक्ति को अपने व्यवहार, ताकत और अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी प्रतिक्रिया समझने का अवसर मिलना चाहिए। रोजमर्रा के जीवन में भी यही सोच हमें किसी एक अनुभव के आधार पर अपना पूरा परिचय तय करने से बचने का संकेत देती है।

अपने मन को समझने की शुरुआत कहां से करें

आप उस घटना से शुरुआत करें, जिसने आपको परेशान किया। मान लीजिए, ऑफिस की मीटिंग के बाद आपका मन खराब है। सिर्फ आज मूड अच्छा नहीं है - लिखने के बजाय थोड़ा रुककर याद करें कि मीटिंग में क्या हुआ था। आपकी बात बीच में काट दी गई? सुझाव पर जवाब नहीं मिला? या आप बोलना चाहते थे, लेकिन बोल नहीं पाए?

अब उस घटना के साथ मन में आया विचार भी लिखें। शायद आपने सोचा हो कि मेरी बात की कोई अहमियत नहीं है। इस तरह घटना और उसके बारे में आपकी समझ, दोनों सामने आ जाती हैं। आगे बातचीत करने पर पता चल सकता है कि समय कम था। यह भी संभव है कि आपकी चिंता सही हो और काम के तरीके पर चर्चा जरूरी हो। उद्देश्य हर घटना को अच्छा साबित करना नहीं है। पहले यह समझना है कि आपको चोट किस बात से लगी।

मूड दर्ज करें, लेकिन उसके साथ वजह भी लिखें

ऐप में ‘खुश’, ‘उदास’ या ‘परेशान’ चुनना शुरुआत हो सकती है। लेकिन उस भावना के साथ थोड़ा संदर्भ जोड़ेंगे तो बाद में उसे समझना आसान होगा। लंबी डायरी लिखने की जरूरत नहीं। कुछ पंक्तियां काफी हैं- आज क्या हुआ, कैसा महसूस हुआ, मन में क्या विचार आया और आपने क्या किया।

ऐसे नोट्स काउंसलर के साथ बातचीत में भी काम आ सकते हैं। डिजिटल टूल्स में अनुभव और लक्षण दर्ज करने की सुविधा मानसिक स्वास्थ्य सहायता के संभावित उपयोगों में शामिल है। हालांकि, नोट्स अपने आप में किसी समस्या की जांच या इलाज नहीं हैं।

बार-बार दिखने वाले पैटर्न का क्या करें

कुछ दिनों के नोट्स पढ़ने पर कोई बात बार-बार सामने आ सकती है। शायद अपनी बात न रख पाने के बाद आप देर तक परेशान रहते हों। या किसी खास जिम्मेदारी से पहले घबराहट महसूस होती हो। यहां तुरंत निष्कर्ष निकालने के बजाय अगला सवाल पूछें- इस परिस्थिति में मेरे लिए सबसे मुश्किल हिस्सा क्या है?

मान लीजिए, मीटिंग से पहले बोलने को लेकर असहजता दिख रही है। अगली बार अपनी दो मुख्य बातें पहले लिखकर देख सकते हैं। अगर किसी अधूरी बातचीत के बाद मन उलझता रहता है, तो उसे शांत समय में पूरा करने पर विचार कर सकते हैं। ये छोटे प्रयोग हैं। उनसे यह देखने का मौका मिलता है कि किस तरह की तैयारी या सहायता आपके लिए उपयोगी लगती है।

लेकिन किसी पैटर्न को उसकी वजह का प्रमाण न मानें। कम नींद और चिड़चिड़ापन साथ दिखें तो भी हर बार गुस्से की वजह केवल नींद नहीं होगी। ऐप जानकारी इकट्ठी कर सकता है। उस जानकारी का मतलब समझने के लिए संदर्भ जरूरी रहता है।

पर्सनैलिटी रिपोर्ट को अपनी पहचान न बना लें

मूड डायरी से आगे कुछ ऐप्स व्यक्तित्व या व्यवहार का आकलन भी देते हैं। रिपोर्ट में ‘अंतर्मुखी’, ‘संवेदनशील’ या ‘फैसलों में झिझक’ जैसे शब्द दिखें तो देखें कि वे आपके किन अनुभवों से मेल खाते हैं। किसी शब्द को पकड़कर यह तय न कर लें कि आप हमेशा ऐसे ही रहेंगे।

हो सकता है, अनजान लोगों के बीच बोलना कठिन लगे, जबकि अपनी टीम में आप सहज हों। बड़े फैसलों में समय लेना और रोज के छोटे चुनावों में उलझना भी अलग बातें हैं। इसलिए रिपोर्ट पढ़ने के बाद अपने उदाहरण याद करें। कौन-सी बात सही लगी? कौन-सी अधूरी लगी? किस निष्कर्ष से आप सहमत नहीं हैं? यही सवाल रिपोर्ट को उपयोगी बातचीत का आधार बना सकते हैं।

एआई की रिपोर्ट के बाद काउंसलर क्यों जरूरी हो सकता है

ऐप आपके जवाबों में पैटर्न तलाश सकता है, लेकिन आपके जीवन का पूरा संदर्भ कुछ सवालों में नहीं समा सकता। हाल में किसी अपने को खोना, नौकरी बदलना या घर में कठिन दौर से गुजरना आपके अनुभवों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में एक जैसी प्रतिक्रिया को समझने के लिए अलग-अलग लोगों से अलग सवाल पूछने पड़ सकते हैं।

काउंसलर के सामने रिपोर्ट के साथ अपने अनुभव भी रखें। केवल उसका निष्कर्ष पढ़कर न सुनाएं। बताएं कि परेशानी कब होती है, उसके बाद आप क्या करते हैं और रोजमर्रा के जीवन पर कितना असर पड़ता है। करियर और व्यवहार संबंधी आकलनों की व्याख्या में ऐसी बातचीत महत्वपूर्ण रहती है।

मानसिक स्वास्थ्य ऐप चुनते समय क्या जांचें

जब आप इतनी निजी बातें किसी प्लेटफॉर्म पर लिखने वाले हों, तो उसकी गोपनीयता नीति पढ़ना जरूरी है। आपके जवाब कौन देख सकता है? डेटा किस काम में इस्तेमाल होगा? क्या उसे मिटाने की सुविधा है? इसके साथ यह भी देखें कि रिपोर्ट बनाने या सलाह देने वाले पेशेवरों की योग्यता क्या है।

ऐप की उपयोगिता पर उपलब्ध शोध और उसकी फीस भी जांचें। कहीं मुफ्त आकलन के बाद रिपोर्ट या काउंसलिंग के लिए अलग भुगतान तो नहीं करना होगा? NIMH के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य ऐप्स की प्रभावशीलता के बारे में जानकारी सीमित हो सकती है। इसलिए आकर्षक इंटरफेस और अच्छी रेटिंग के साथ वैज्ञानिक प्रमाण, डेवलपर की विश्वसनीयता और निजी जानकारी की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।

कब सीधे काउंसिलिंग लेनी चाहिए

अगर परेशानी लगातार बनी हुई है, रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हैं, तो योग्य साइकिएट्रिस्ट से सहायता लें। तत्काल खतरे की स्थिति में ऐप के जवाब या रिपोर्ट का इंतजार करने के बजाय आपातकालीन मदद लें।

आज शुरुआत करनी हो तो फोन में एक सवाल लिखिए कि जिस बात ने आपको परेशान किया, उसमें सबसे मुश्किल क्या था? जवाब तुरंत न आए तो उसे थोड़ा समय दें। ऐप का उपयोग तब सार्थक हो सकता है, जब उससे मिली जानकारी आपको अपना अनुभव स्पष्ट करने, अगला छोटा कदम चुनने और जरूरत पड़ने पर मदद मांगने में सहारा दे।

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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