Asthma symptoms in children In Hindi: बच्चों में अस्थमा एक गंभीर लेकिन नियंत्रित की जाने वाली बीमारी है। यह एक लंबे समय तक चलने वाली श्वसन समस्या है जिसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और हवा का प्रवाह रुकने लगता है। जब बच्चा धूल, धुआं, परागकण, पालतू जानवरों के बाल, प्रदूषण, ठंडी हवा या किसी संक्रमण के संपर्क में आता है तो उसे सांस लेने में तकलीफ होती है।
छोटे बच्चों में अस्थमा पहचानना मुश्किल क्यों होता है
छोटे बच्चे अपने लक्षण साफ-साफ बता नहीं पाते। अक्सर माता-पिता इसे सामान्य सर्दी-खांसी या मौसम का असर समझकर अनदेखा कर देते हैं। यही वजह है कि अस्थमा का पता देर से चलता है और स्थिति बिगड़ सकती है।
अस्थमा के मुख्य कारण क्या हैं
- अगर परिवार में किसी को अस्थमा या एलर्जी है, तो बच्चों में खतरा ज्यादा होता है।
- बार-बार सर्दी-जुकाम या श्वसन संक्रमण होना।
- प्रदूषण, धूल-मिट्टी, ठंडी हवा और मौसम का अचानक बदलना।
- कमजोर इम्यूनिटी और पोषण की कमी।
- मानसिक तनाव या डर, रोना जैसी भावनात्मक स्थितियां भी ट्रिगर बन सकती हैं।
हर खांसी अस्थमा नहीं होती, पहचानें असली संकेत
- अगर बच्चा बार-बार खांसता है, खासकर रात या सुबह जल्दी।
- सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आती है।
- छाती में जकड़न महसूस करता है।
- खेलते या दौड़ते समय जल्दी थक जाता है।
तो यह अस्थमा का संकेत हो सकता है। ऐसे में डॉक्टर से तुरंत सलाह लेना जरूरी है।
सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है खतरा
सर्दियों के मौसम में हवा ठंडी और शुष्क होती है, जिससे बच्चों को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। इस वजह से अस्थमा अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
कई लोग मानते हैं कि दूध या ठंडी चीजें अस्थमा को बढ़ाती हैं, लेकिन असल में धूल, प्रदूषण और एलर्जी असली ट्रिगर हैं।
कुछ बच्चों में दौड़ने या खेलकूद के बाद भी अस्थमा के लक्षण बढ़ सकते हैं।
बचाव के आसान और असरदार तरीके
- बच्चों को धूल, धुएं और पालतू जानवरों के बालों से दूर रखें।
- घर में नमी या फफूंद (फंगस) न बनने दें।
- पौष्टिक आहार दें जिसमें इम्यूनिटी बढ़ाने वाले तत्व हों।
- हल्दी वाला दूध, अदरक, तुलसी और गिलोय जैसी चीजें फायदेमंद हैं।
- बच्चों को हल्का व्यायाम और प्राणायाम (जैसे अनुलोम-विलोम) करवाएं।
- मौसम बदलते वक्त बच्चों की खास देखभाल करें।
निष्कर्ष
बच्चों में अस्थमा कोई डरने वाली बीमारी नहीं, बल्कि सावधानी और सही इलाज से इसे पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है। माता-पिता को बस इतना ध्यान रखना है कि लक्षणों को हल्के में न लें और समय रहते विशेषज्ञ से सलाह लें।
Source: IANS
