Caste Census : कल तक जाति जनगणना कराने की विपक्ष की मांग पर आना-कानी और ढुलमुल रवैया अख्तियार करने वाली मोदी सरकार के सुर 30 अप्रैल को अचानक से बदल गए। उसने जाति जनगणना कराने का ऐलान कर दिया। हालांकि उसने यह नहीं बताया कि वह इसे कब कराने जा रही है। सरकार के अचानक लिए गए इस फैसले से कांग्रेस राजद सपा सहित विपक्ष के वे सभी दल भौचक्के रह गए जो इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर ओबीसी को अपनी तरफ खींचने और भाजपा को घेरने में जुटे थे। जाहिर है कि जाति आधारित जनगणना के अपने फैसले से मोदी सरकार ने विपक्ष के हाथ से राजनीतिक का एक बड़ा मुद्दा छीन लिया है। इसकी घोषणा करते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यह कहना नहीं भूले कि कुछ राज्यों द्वारा कराए गए जातिगत सर्वे पारदर्शी नहीं हैं। जाहिर है उनका इशारा बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों की तरफ था।
फैसले के बाद श्रेय लेने की विपक्ष में मच गई होड़
विपक्ष के सभी दलों ने सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है। जाति जनणना की मांग पर सबसे ज्यादा मुखर रहने वाली पार्टियां चाहे वह कांग्रेस हो राजद हो या सपा सभी में इसका श्रेय लेने की होड़ मची है। सभी ने यही कहा कि वे लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे। माना जाता है कि देश की आबादी में बावन फीसदी लोग पिछड़ी और अति पिछड़ी जाति के हैं। ओबीसी समुदाय के नेताओं का मानना है कि इस हिसाब से राजनीति में उनकी हिस्सेदारी बहुत कम है। राजद जैसे दल 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी' के आधार पर आरक्षण चाहते हैं। कांग्रेस आरक्षण को पचास फीसदी से ऊपर ले जाना चाहती है। यह सब सभी जातियों का जातिगत डाटा सामने आने पर ही संभव है। बहरहाल, जाति जनगणना कराने पर जो एक ऊहापोह की जो स्थिति बनी हुई थी वह अब समाप्त हो गई है। आजादी के बाद जाति आधारित जनगणना की यह घोषणा कैसे यहां तक पहुंची इसे भी यहां जानना जरूरी है।
अभी जाति जनगणना का ताजा आकंड़ा 1931 का
दरअसल, आजादी के बाद उन्नीस सौ इक्वान में जब पहली जनगणना हुई तो इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और अलग-अलग धार्मिक समूहों के लोगों का व्यक्तिगत डाटा तो जुटाया गया लेकिन इन्हें छोड़कर अन्य जाति समूहों की गणना नहीं हुई। ऐसे में जाति जनगणना का जो सबसे ताजा आंकड़ा उपलब्ध है, वह 1931 का है। इसके बाद 1941 में हुई जनगणना में जातिगत डाटा एकत्र किया गया था लेकिन इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके बाद से जाति जनगणना कराने की मांग लगातार उठती रही। यह मांग खास तौर से उन राजनीतिक दलों की ओर से प्रमुखता से की गई जिनका अन्य पिछड़ा वर्ग में जनाधार और पकड़ है।

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सरकारें इसे ठंडे बस्ते में डालती रहीं
बाद के दशकों में कई सरकारें आईं और गईं। पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वाले दलों ने इस दौरान भी जाति जनगणना कराने की मांग की और दबाव बनाया लेकिन सरकारें कोई न कोई वजह गिनाकर इसे ठंडे बस्ते में डालती रहीं। किसी भी सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान पूर्ण रूप से जातिगत गणना कराने का जोखिम नहीं उठाया। 2011 में जब जनगणना कराने की बारी आई तो तत्कालीन कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखते हुए यह कहा कि जनगणना 2011 में जाति और समुदाय के आधार पर लोगों का डाटा जुटाया जाना चाहिए।
2010 में यूपीए के दलों ने जाति जनगणना कराने की मांग की
मोइली के इस सुझाव को प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसे रजिस्ट्रार जनरल और सेंशस कमिश्नर ऑफ इंडिया के पास आगे बढ़ा दिया। यहां इस सुझाव को खारिज कर दिया गया। इससे पहले मई 2010 में राजद, सपा, डीएमके, जेडीयू और ओबीसी समुदाय से आने वाले भाजपा के कुछ सांसदों ने जाति जनगणना कराने की मांग की थी। इन दलों की इस मांग पर तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने संसद को बताया कि जाति जनगणना कराने में लॉजिस्टिक से जुड़ीं कई तरह की पेचीदिगियां और व्यावहारिक दिक्कते हैं। चिदंबरम ने संसद को जातिगत जनगणना और जनगणना के बारे में फर्क समझाया। उन्होंने बताया कि 21 लाख जनगणना कर्मियों में ज्यादातर प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं और इन्हें जातिगत जनगणना करने का प्रशिक्षण नहीं दिया गया है।

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एसईसीसी पर खर्च हुए 4,900 करोड़ रुपए
चिदंबरम की दलीलों और तर्कों से यूपीए के ही दल सहमत नहीं थे। वे सरकार पर दबाव बनाते रहे। उनका यह दबाव रंग लाया और फिर मनमोहन सिंह की सरकार ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में जीओएम यानी एक मंत्री समूह का गठन किया। इस मंत्री समूह को जिम्मेदारी दी गई कि वह देखे की जाति जनगणना कराया जा सकता है कि नहीं। कुछ समय बाद इस जीओएम ने सरकार को अपने सुझाव भेजे और इस सुझाव पर कैबिनेट ने सितंबर 2010 में अलग से एक सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना कराने का फैसला किया। इस सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना यानी एसईसीसी पर करीब 4,900 करोड़ रुपए खर्च हुए।
2016 में सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना पेश
ग्रामीण एवं शहरी विकास मंत्रालय ने 2016 में इस डाटा को सार्वजनिक भी किया लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि इसमें जाति जनगणना के डाटा को शामिल नहीं किया गया। जाति जनगणना के कच्चे डाटा को सरकार ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के पास भेज दिया और इस विभाग ने जाति जनगणना का वर्गीकरण करने और श्रेणी बनाने का जिम्मा नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया को सौंप दिया। इसके लिए पनगढ़िया के नेतृत्व में एक एक्सपर्ट ग्रुप का गठन भी हुआ। इस एक्सपर्ट ग्रुप ने क्या किया और कौन से सुझाव दिए यह अभी भी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
