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फकीर, संत या अवतार? कौन हैं साईं बाबा जिन पर बार-बार खड़ा होता है सवाल

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 3, 2023, 02:36 PM IST

who is Sai Baba: साईं बाबा को लेकर बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री ने विवादित बयान दिया है। इसके बाद से फिर से यह सवाल खड़े होने लगे हैं कि आखिर साईं बाबा कौन थे? कुछ लोग उन्हें एक संत तो कुछ फकीर कहते हैं, लेकिन साईं बाबा के भक्तों के लिए वह भगवान का अवतार थे।

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शिरडी के साईं बाबा

Photo : iStock

Shirdi Sai Baba: शिरडी के साईं बाबा के देश-दुनिया में लाखों की संख्या में भक्त हैं। हर साल बड़ी संख्या में ये भक्त साईं दर्शन करने के लिए शिरडी पहुंचते हैं। भक्त साईं बाबा को ईश्वर का अवतार मानते हैं और उनके चमत्कारों पर चर्चा करते हैं। हालांकि, साईं बाबा को लेकर अक्सर एक सवाल खड़ा होता है कि क्या वे वाकई में भगवान थे?

साईं बाबा एक फकीर थे, संत थे या फिर अवतार इसको लेकर विरोधाभास है और तरह-तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोग साईं बाबा को हिंदू तो कुछ मुस्लिम बताते हैं। हालांकि, यह बात भी सच है कि दोनों ही समुदाय के लोग साईं बाबा को पूजते हैं और वह स्वयं भी सभी धर्मों का सम्मान करने वाले थे। आइए जानते हैं साईं बाबा के बारे में...

साईं बाबा का जन्म कब हुआ था?

साईं बाबा के जन्म को लेकर विद्वानों में विरोधाभास है। तरह-तरह के दावे किए जाते हैं। वह कौन थे? उनका जन्म कहां हुआ था और उनके माता-पिता कौन थे, इस बात का जिक्र खुद साईं ने कभी नहीं किया। हालांकि, ऐसा माना जाता है कि साईं बाबा का जन्म 28 सितंबर 1836 को महाराष्ट्र के पाथरी गांव में हुआ था। यही कारण है कि हर साल इसी दिन साईं का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

16 की उम्र में पहुंचे शिरडी

साईं बाबा 16 साल की उम्र में शिरडी में दिखाई दिए। वह हमेशा एक नीम के पेड़ के नीचे समाधि में लीन रहते थे, पहले लोग उन्हें पागल समझते थे, लेकिन धीरे-धीरे लोग उनकी बातों का अनुसरण करने लगे और बाबा के भक्त बढ़ते चले गए। यही कारण है कि महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शिरडी गांव में साईं मंदिर स्थित है। इस मंदिर से लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। साईं बाबा ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा पुरानी मस्जिद में बिताया, इसलिए लोग इन्हें मुस्लिम मानते थे। हालांकि द्वारिका के प्रति उनकी श्रद्धा को देखते हुए उन्हें हिंदू भी माना जाता है।

अब जानिए नया विवाद क्या है

बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री ने साईं बाबा को लेकर कहा है कि हमारे धर्म के शंकराचार्य ने साईं बाबा को देवताओं का स्थान नहीं दिया है। शंकराचार्य की बात मानना हर सनातनी का धर्म है। उन्होंने कहा, लोगों की अपनी-अपनी निजी आस्थाएं हैं और हम किसी को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते। इतना कह सकते हैं कि साईं बाबा संत हो सकते हैं, फकीर हो सकते हैं मगर भगवान नहीं। गीदड़ की खाल पहन लेने से कोई शेर नहीं हो जाता है।

साईं भक्त क्या कहते हैं

धीरेंद्र शास्त्री के बयान से साईं भक्तों में आक्रोश है। साईं बाबा के भक्तों का कहना है कि किसी की भी आस्था पर इस तरह के सवाल नहीं खड़े करने चाहिए। उनका कहना है कि साईं बाबा ने कई चमत्कार किए हैं। हमारे लिए वह एक ईश्वर का रूप हैं।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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