Delhi News: अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास की दिल्ली इकाई इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती का राज्यस्तरीय कार्यक्रम मंडी हाउस स्थित मेघदूत थिएटर में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में साहित्य के जरिए सर्वहित की भावना को व्यापक स्तर पर पहुंचाने और दिल्ली-एनसीआर में साहित्यिक गतिविधियों को नई गति देने का संकल्प लिया गया। इस दौरान संगठन की नई कार्यसमिति की घोषणा के साथ साहित्यिक पत्रिका 'साहित्य परिक्रमा' के नए स्वरूप का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना और साहित्य भारती के उद्देश्य गीत 'लोकमंगल की कामना' के गायन से हुई।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉ. सुशीलचंद्र त्रिवेदी ने दिल्ली प्रांत की कार्यसमिति की औपचारिक घोषणा की। रामशरण गौड़ को संरक्षक, विनोद बब्बर को अध्यक्ष, पूनम माटिया को उपाध्यक्ष, मनोज शर्मा को महामंत्री और मुन्ना रजक को कोषाध्यक्ष बनाया गया। इसके अलावा प्रो. ममता को 'साहित्य परिक्रमा', मलखान सिंह को लोक साहित्य, राकेश कुमार को बाल साहित्य, सारिका कालरा को युवा कार्य और दिनेश वत्स को प्रचार कार्य की जिम्मेदारी दी गई। सरदार जगदीश सिंह और सुनीता बुग्गा को कार्यसमिति में सदस्य का दायित्व सौंपा गया। डॉ. सुशीलचंद्र त्रिवेदी ने कहा कि साहित्यकारों को सामूहिक प्रयास के जरिए भारतीय चेतना को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने का काम करना चाहिए। उनका कहना था कि साहित्य में निहित सर्वहित का संदेश देश की सीमाओं से आगे वैश्विक स्तर तक पहुंचाया जा सकता है।
साहित्य परिक्रमा के नए कलेवर का प्रकाशन दिल्ली से होगा
कार्यक्रम के दौरान दिल्ली-एनसीआर के दस साहित्य केंद्रों पर नियमित मासिक गतिविधियों के संचालन के लिए संयोजक, सह-संयोजक और कार्यालय टोली की भी घोषणा की गई। वहीं, 'साहित्य परिक्रमा' के नए कलेवर को लेकर प्रबंध संपादक डॉ. रजनी ने बताया कि पत्रिका का प्रकाशन अब ग्वालियर के बजाय दिल्ली से होगा। नए स्वरूप में पत्रिका की विषयवस्तु को अधिक विविध और समकालीन बनाने के लिए 'कलालोक', 'लोकालोक' और 'भाषा-सुभाषा' जैसे नए स्तंभ जोड़े गए हैं। नए अंक में वंदे मातरम् से जुड़े ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राष्ट्रीय संदर्भों को प्रमुखता दी गई है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के महामंत्री पवनपुत्र बादल ने कहा कि पत्रिका का नया स्वरूप भारतीय परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए युवाओं को नई दृष्टि देने का प्रयास है। उन्होंने बताया कि भाषा-सुभाषा के जरिए विभिन्न भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को सम्मान देने की पहल की जा रही है। इसकी शुरुआत तमिल भाषा की रचना को मूल लिपि में प्रकाशित करके की गई है।
विभाजन की त्रासदी ने किया भावुक
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण '1947 स्मृतियों के झरोखे से- विभाजन की विभीषिका' विषय पर नाट्य प्रस्तुति रही। अदिति महाविद्यालय की छात्राओं ने साहित्यकार यशपाल की कृति 'झूठा सच' से प्रेरित इस नाटक के माध्यम से भारत विभाजन के दौरान हुए विस्थापन और मानवीय पीड़ा को मंच पर जीवंत किया। नाटक में उन परिवारों की पीड़ा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिन्हें विभाजन के दौरान अपना घर, गांव, परिवेश और प्रियजनों को पीछे छोड़कर अनजान स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा। प्रस्तुति में विस्थापन के बावजूद जन्मभूमि से जुड़ी यादों और भावनाओं को संजोए रखने की संवेदना को प्रमुखता दी गई। कार्यक्रम में साहित्य और संस्कृति जगत से जुड़े कई गणमान्य लोगों के साथ अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पदाधिकारी भी मौजूद रहे।
