Russia Ukraine war : गत 24 फरवरी को रूस-यूक्रेन युद्ध के एक साल पूरे हो गए। युद्ध की विभीषका में एक साल तक जलने के बाद भी दोनों देश एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए आतुर हैं। दोनों तरफ से हमले जारी हैं। यह युद्ध कब रुकेगा इसके बारे में कुछ भी साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के यूक्रेन दौरे ने इस युद्ध को आगे जारी रखने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। पूरी दुनिया पर असर डालने वाला यह युद्ध आगे कौन सा करवट लेगा इसे लेकर अनिश्चितता एवं दुविधा बरकरार है।
क्या रूस के लक्ष्य पूरे हुए?
यहां एक दो बातें बेहद जरूरी हैं जिन पर चर्चा करने की जरूरत है। पहला यह कि रूस ने अपने जिन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए यूक्रेन पर हमला किया क्या वे लक्ष्य पूरे हुए? या उसे किस हद तक सफलता मिली। दूसरा, रूस को आर्थिक एवं सैन्य रूप से सीमित करने या उसे नुकसान पहुंचाने की अपनी कोशिशों में अमेरिका कितना सफल हुआ। रूस की बात करें तो जाहिर है कि राष्ट्रपति पुतिन अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाए हैं। दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की राय थी कि महाशक्ति रूस के आगे यूक्रेन टिक नहीं पाएगा और कुछ हफ्तों एवं महीनों में रूस उसका खेल तमाम कर देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यूक्रेन की सेना और लोगों ने जिस तरह से रूसी सैनिकों का सामना किया, उससे रूस को बड़ा झटका लगा। युद्ध के बारे में सबसे सटीक भविष्यवाणी कैसे धूल-धूसरित हो जाती है, यूक्रेन उसका 'क्लासिकल' उदाहरण है।
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युद्ध नीति में रूस ने दिखाई नादानी
इस युद्ध में रूस जैसी महाशक्ति को झटका लगने के पीछे कई कारण गिनाए जा रहे हैं। सामरिक नीतियों के एक्सपर्टों का मानना है कि यूक्रेन को लेकर मास्को ने 'मिस कैलकुलेशन' किया। आप जिस दुश्मन पर हमला करते हैं, उसकी तादाद से तीन से चार गुना फौज आपको युद्ध के मैदान में उतारनी पड़ती है। पेशेवर सैनिक एवं अनुभवी कमांडरों का कौशल एवं योग्यता युद्ध को अपने पक्ष में करती है। ऐसा देखने में आया कि रूस ने युद्ध नीति के इन दोनों ही पहलुओं पर नादानी दिखाई। यूक्रेन के मोर्चों पर उसने अपने नियमित एवं पेशेवर फौज को नहीं लगाया। पेशेवर फौज दुश्मन की जमीन एवं क्षेत्र अपने कब्जे में लेकर अपनी शर्तों पर मोलभाव करती है।यूक्रेन दौरे से बाइडेन ने दिया संदेश
यूक्रेन को लेकर पुतिन यदि अपने उद्देश्यों में सफल हुए होते तो युद्ध के एक साल बाद वह अपनी शर्तों पर युद्ध विराम एवं शांति की पेशकश या पहल करते लेकिन ऐसा नहीं है। अमेरिका की अगुवाई में नाटो देशों से मिल रही सैन्य एवं आर्थिक मदद से यूक्रेन ज्यादा प्रभावी रूप से अपनी सुरक्षा और रूस को नुकसान पहुंचा रहा है। बाइडेन के यूक्रेन दौरे ने उसे एक नई ताकत एवं उसकी सेना एवं लोगों में जोश भरा है। बाइडेन ने साफ कहा है कि उनका देश यूक्रेन के साथ खड़ा है। अमेरिका का यूक्रेन के साथ खड़ा होना यह इस बात की ओर साफ इशारा करता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अभी जारी रहेगा।
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महाशक्तियों को आपदा में अवसर देते हैं युद्ध
बीते साल अफगानिस्तान से निकलने के बाद अमेरिका की सुपरपवार की श्रेष्ठता पर सवाल उठे। अपने सुपरपावर के नरेटिव एवं श्रेष्ठता साबित करने के लिए उसे यूक्रेन जैसे एक माहौल की जरूरत थी। इस युद्ध के जरिए अमेरिका ने पश्चिमी एवं नाटो देशों में अपनी पकड़ और मजबूत की है। बहुत कुछ अनुमान इस बात का है कि इस युद्ध के अंतिम नतीजे में सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका को होने वाला है। अमेरिका की ओर से युद्ध की घोषणा होने के बाद उसके यहां हथियारों का निर्माण करने वाली कंपनियां हथियारों का उत्पादन तेज कर देती हैं। ये हथियार युद्ध ग्रस्त देश में भेजे जाते हैं जैसा कि यूक्रेन मामले में देखा जा रहा है। युद्ध महाशक्तियों को आपदा में अवसर देते हैं। यूक्रेन युद्ध ने नाटो देशों को अपनी सुरक्षा के लिए नए सिरे से चिंतित किया। जर्मनी ने आगामी वर्षों के लिए अपने रक्षा बजट को कई गुना बढ़ा दिया है। नाटो में शामिल वे देश जिन्हें रूस से खतरा नजर आता है, वे भी नए हथियार खरीदने की तैयारी कर रहे हैं।
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