Ethanol Vs Petrol : भारत को तेजी से आगे बढ़ने के लिए किफायती और निर्बाध ऊर्जा चाहिए। Hormuz Crisis ने Crude Oil के आयात को लेकर भारी निर्भरता ने तीव्र आर्थिक विकास की राह की कई अड़चनों को उजागर किया है। हालांकि, सरकार इस तरह की स्थितियों से निपटने के लिए पहले से तैयारी करती आ रही है। लेकिन, Crude Oil Price Shock के सामने ये तैयारियां नाकाफी साबित हुईं। नतीजतन, सरकार को देश में डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ाने पड़े।
क्रूड आयात की निर्भरता घटाने के लिए सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर बड़ा फैसला करते हुए E30, E85 और E100 जेसे फ्यूल के इस्तेमाल की राह खोल दी है। हालांकि, इस मामले में 'कॉस्ट टू बेनिफिट' यानी बदलावों की लागत और उनके नतीजों को लेकर बहस छेड़ दी है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से देश को ऊर्जा आत्मनिभर बनने में मदद मिलेगी। वहीं, इसके आलोचकों का कहना है कि सरकार यह कदम जल्दबाजी में उठा रही है, जो आम लोगों के हित में नहीं।
बहरहाल, हम यहां इस बहस से इतर इथेनॉल और पेट्रोल के प्रोडक्शन को विशुद्ध आर्थिक नजरिये से देखते हैं कि असल में कौन कितना महंगा पड़ता या सस्ता और क्या वाकई इथेनॉल ब्लेंडिंग भारत के क्रूड आयात को घटाने की क्षमता वाला समाधान है।
क्या सच में पेट्रोल से महंगा है इथेनॉल?
अगर सिर्फ स्थापित वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के आधार पर इस सवाल का जवाब दिया जाए, तो मौजूदा स्थिति में प्रति लीटर उत्पादन लागत के लिहाज से पेट्रोल असल में इथेनॉल से सस्ता पड़ता है।
भारत में रिफाइनरी से निकलने वाले पेट्रोल की बेस उत्पादन लागत आमतौर पर 54 से 57 रुपये प्रति लीटर के बीच रहती है। बाद में रिफाइनिंग, फ्रेट और अन्य परिचालन खर्च जोड़ने के बाद यह लागत करीब 76 से 79 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचती है।
इसके मुकाबले तेल कंपनियां अलग-अलग फीडस्टॉक से बने इथेनॉलके लिए 58 रुपये से लेकर करीब 72 रुपये प्रति लीटर तक भुगतान करती हैं। पहली नजर में यह अंतर बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन असली तस्वीर इसके बाद सामने आती है।
खरीद कीमत नहीं, असली खर्च कहीं ज्यादा
इथेनॉल की खरीद कीमत उसकी वास्तविक लागत नहीं होती। सरकार इसके उत्पादन के लिए उर्वरक, बिजली, सिंचाई, खाद्यान्न और कई दूसरी तरह की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सहायता देती है। यही वजह है कि सार्वजनिक वित्त पर इसका वास्तविक बोझ काफी बढ़ जाता है।
खुद सरकार के विश्लेषण बताते हैं कि चावल से बनने वाले इथेनॉल की वास्तविक राजकोषीय लागत करीब 126 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है। वहीं, मक्का आधारित इथेनॉल की वास्तविक लागत करीब 95 रुपये और गन्ने के रस से बने इथेनॉल की करीब 85.5 रुपये प्रति लीटर आंकी गई है।
यहां भी पेट्रोल से पीछे रह जाता है एथेनॉल
यहां मामला सिर्फ लागत का नहीं है। इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता भी पेट्रोल से कम होती है। एक लीटर पेट्रोल लगभग 32 मेगाजूल ऊर्जा देता है, जबकि एक लीटर इथेनॉल से करीब 21 मेगाजूल ऊर्जा मिलती है। यानी समान दूरी तय करने के लिए इथेनॉल की मात्रा ज्यादा चाहिए। इसी वजह से E20 ईंधन इस्तेमाल करने वाले सामान्य वाहनों में माइलेज में लगभग 1 से 1.5 किलोमीटर प्रति लीटर तक की कमी देखी जा सकती है। भविष्य में नए इंजन डिजाइन से इस अंतर को कम किया जा सकता है, लेकिन मौजूदा समय में यह चुनौती बनी हुई है।
इथेनॉल बनाम पेट्रोल का पूरा गणित समझें
ऊर्जा के हिसाब से खर्च और बढ़ जाता है
जब लागत की तुलना ऊर्जा क्षमता के आधार पर की जाती है, तो तस्वीर और चौंकाने वाली बन जाती है। Council on Energy, Environment and Water (CEEW) के एक अध्ययन के मुताबिक समान ऊर्जा देने के लिए गन्ने आधारित इथेनॉल की प्रभावी लागत करीब 130 रुपये प्रति लीटर के बराबर बैठती है। मक्का आधारित इथेनॉल की लागत करीब 145 रुपये और चावल आधारित इथेनॉल की प्रभावी लागत लगभग 192 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है।
वहीं, दूसरी तरफ अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DOE), अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) और कई इंजीनियरिंग हैंडबुक में स्वीकार किए गए मानकों के हिसाब से समान ऊर्जा के सिद्धांत के आधार पर पेट्रोल कहीं सस्ता साबित होता है। क्योंकि, ऊर्जा-समतुल्यता के आधार पर देखें तो कुछ मामलों में इथेनॉल पेट्रोल की तुलना में लगभग तीन गुना तक महंगा पड़ सकता है।
फिर सरकार आखिर क्यों बढ़ा रही है एथेनॉल?
भले ही विज्ञान और आर्थिकी के तर्क यह बताते हैं कि इथेनॉल महंगा है, लेकिन फिर भी सरकार इसे बढ़ावा दे रही है। क्योंकि, जवाब सिर्फ उत्पादन लागत में नहीं बल्कि देश की दीर्घकालिक रणनीति हितों में छिपा है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने या पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है। इथेनॉल मिश्रण बढ़ने से पेट्रोल की खपत घटती है और विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद
इथनॉल ब्लेंडिंग का दूसरा बड़ा फायदा किसानों को मिलता है। गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से इथेनॉलबनने पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ता है। इससे चीनी मिलों और डिस्टिलरी उद्योग को भी अतिरिक्त बाजार मिलता है। इसके अलावा इथेनॉल मिश्रण से कार्बन उत्सर्जन घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में भी मदद मिलती है। यही वजह है कि सरकार इसे सिर्फ ईंधन नहीं बल्कि रणनीतिक निवेश के रूप में देख रही है।
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