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भारत को यूरेनियम बेचने पर क्यों राजी हुआ ऑस्ट्रेलिया? समझें इंडिया की 'पीस डिप्लोमेसी' ने कैसे जीता दुनिया का भरोसा

India-Australia Uranium Deal: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति समझौता दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। लंबे समय तक एनपीटी नीति के कारण ऑस्ट्रेलिया, भारत को यूरेनियम नहीं बेचता था, लेकिन एनएसजी की छूट, IAEA समझौते और बढ़ते आपसी भरोसे के बाद यह रास्ता खुला। भारत इस यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए करेगा।

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भारत-ऑस्ट्रेलिया ने यूरेनियम डील पर मुहर लगा दी। AI IMAGE
Authored by: Piyush Kumar
Updated Jul 10, 2026, 12:06 IST
KEY HIGHLIGHTS
भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

वर्ष 2008 में NSG ने भारत को विशेष छूट दी।

यूरेनियम का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए कर रहा भारत।

India-Australia Uranium Deal: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन दिवसीय ऑस्ट्रेलिया दौरा बेहद अहम रहा। इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह था, जब दोनों देशों ने यूरेनियम डील पर मुहर लगा दी। मेलबर्न में प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, अंतरिक्ष (स्पेस) और महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स) समेत कई क्षेत्रों में समझौतों की घोषणा की।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया मिलकर क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर भी विकसित करेंगे। साथ ही, कोकोस (कीलिंग) द्वीप पर स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल बनाया जाएगा, जिससे भारत के गगनयान मिशन को मदद मिलेगी। बात दें कि भारत अभी चार देशों से यूरेनियम खरीदता है और ऑस्ट्रेलिया उसका पांचवां सप्लायर बन गया है। यूरेनियम का उपयोग परमाणु ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ परमाणु हथियारों के निर्माण में भी किया जा सकता है।

लंबे समय तक ऑस्ट्रेलिया का रुख था कि वह केवल उन देशों को यूरेनियम बेचेगा, जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए हों। भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए वर्षों तक उसे ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम नहीं मिल सका। हालांकि, बदलते वैश्विक समीकरण, भारत की मजबूत परमाणु सुरक्षा व्यवस्था और दोनों देशों के बढ़ते रणनीतिक संबंधों ने इस नीति को बदल दिया।

प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की फाइल फोटो।

प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की फाइल फोटो।

पहले ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम क्यों नहीं बेचा?

ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है। उसकी नीति थी कि वह परमाणु सामग्री केवल उन्हीं देशों को बेचेगा, जो एनपीटी का हिस्सा हों। भारत ने 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भी अपनी स्वतंत्र परमाणु नीति जारी रखी और NPT से बाहर रहा। यही कारण था कि ऑस्ट्रेलिया ने लंबे समय तक भारत को यूरेनियम का निर्यात नहीं किया।

आखिर क्या बदल गया?

समय के साथ कई ऐसे घटनाक्रम हुए, जिन्होंने भारत को लेकर ऑस्ट्रेलिया का नजरिया बदल दिया। वर्ष 2008 में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) ने भारत को विशेष छूट दी, जिसके बाद भारत के लिए वैश्विक परमाणु व्यापार के रास्ते खुलने लगे। इसके अलावा, भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौता किया और यह भरोसा भी दिया कि आयातित यूरेनियम का इस्तेमाल केवल शांतिपूर्ण (सिविलियन) परमाणु कार्यक्रमों में किया जाएगा।

इसी दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत होती गई। बढ़ते आपसी विश्वास और सहयोग के चलते दोनों देशों ने 2014 में सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते ने भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात का रास्ता खोल दिया और दोनों देशों के संबंधों को नई मजबूती मिली।

इन चारों देशों से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति होती है। AI IMAGE

इन चारों देशों से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति होती है। AI IMAGE

भारत को यूरेनियम की जरूरत आखिर क्यों है?

भारत यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए नहीं, बल्कि परमाणु ऊर्जा (न्यूक्लियर पावर) के जरिए बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए कर रहा है। देश ने 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। इसका मतलब है कि जितनी ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में छोड़ी जाएंगी, उन्हें उतना ही कम करने या प्राकृतिक तरीकों से संतुलित करने का प्रयास किया जाएगा। इसी वजह से भारत कोयले पर अपनी निर्भरता कम कर स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर जोर दे रहा है।

ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम कितना खास?

ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के ज्ञात और आर्थिक रूप से निकाले जा सकने वाले (Recoverable) यूरेनियम भंडार का लगभग 28 से 30 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है, जो किसी भी अन्य देश से अधिक माना जाता है। यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया वैश्विक यूरेनियम आपूर्ति में अहम भूमिका निभाता है।

देश में यूरेनियम के प्रमुख भंडार साउथ ऑस्ट्रेलिया के ओलंपिक डैम, नॉर्दर्न टेरिटरी के रेंजर और जाबिलुका तथा वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की कई खदानों में स्थित हैं। ये खदानें ऑस्ट्रेलिया को दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम संसाधन वाले देशों में शामिल करती हैं। ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम को उसकी उच्च गुणवत्ता (हाई-ग्रेड) के लिए जाना जाता है। यहां मिलने वाले यूरेनियम अयस्क में धातु की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक और अशुद्धियां कम होती हैं, जिससे उसका खनन अधिक किफायती होता है और उसे परमाणु ईंधन (न्यूक्लियर फ्यूल) में बदलना भी आसान माना जाता है।

इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया की राजनीतिक स्थिरता, मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार (Non-Proliferation) नियमों के प्रति प्रतिबद्धता उसे दुनिया के सबसे भरोसेमंद यूरेनियम आपूर्तिकर्ताओं में शामिल करती है। यही कारण है कि कई देश अपनी परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए ऑस्ट्रेलिया को एक सुरक्षित और विश्वसनीय साझेदार मानते हैं।

ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम को उसकी उच्च गुणवत्ता (हाई-ग्रेड) के लिए जाना जाता है। AP

ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम को उसकी उच्च गुणवत्ता (हाई-ग्रेड) के लिए जाना जाता है। AP

यूरेनियम से बिजली कैसे तैयार होती है?

परमाणु रिएक्टर में यूरेनियम के परमाणुओं का नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) कराया जाता है। इस प्रक्रिया से भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। यह गर्मी पानी को भाप में बदल देती है और उसी भाप के दबाव से टर्बाइन घूमते हैं, जिससे जनरेटर बिजली पैदा करता है।

क्या इसी यूरेनियम से परमाणु बम भी बनाया जा सकता है?

नहीं, बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला यूरेनियम लो-एनरिच्ड यूरेनियम (LEU) होता है, जिसमें यूरेनियम-235 की मात्रा काफी कम होती है। जबकि परमाणु हथियार बनाने के लिए हाई-एनरिच्ड यूरेनियम (HEU) की जरूरत होती है, जिसकी शुद्धता आमतौर पर 90 प्रतिशत या उससे अधिक होती है। इसलिए बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला यूरेनियम सीधे परमाणु हथियार बनाने के काम नहीं आता।

परमाणु संयंत्र की चिमनियों की फोटो।

परमाणु संयंत्र की चिमनियों की फोटो।

क्या यूरेनियम को हथियार-ग्रेड बनाना आसान है?

बिल्कुल नहीं, लो-एनरिच्ड यूरेनियम को हाई-एनरिच्ड स्तर तक पहुंचाने के लिए गैस सेंट्रीफ्यूज जैसी अत्याधुनिक तकनीक, बड़े औद्योगिक ढांचे, भारी निवेश और लंबी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि परमाणु हथियार विकसित करना बेहद जटिल और कठिन माना जाता है।

यूरेनियम के इस्तेमाल पर निगरानी कौन रखता है?

दुनिया में परमाणु सामग्री के शांतिपूर्ण उपयोग की निगरानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) करती है। यह एजेंसी नियमित निरीक्षण करती है, रिकॉर्ड का सत्यापन करती है और यह सुनिश्चित करती है कि आयातित परमाणु ईंधन का इस्तेमाल केवल नागरिक और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही किया जा रहा है, न कि सैन्य या परमाणु हथियार कार्यक्रमों में।

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