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नीतीश तो बदल गए, अब लालू-तेजस्वी को सता रहा ये खौफ! कहीं फिर से...

Lalu Vs Nitish: नीतीश कुमार ने लालू यादव की आरजेडी का साथ छोड़कर न सिर्फ उन्हें झटका दिया, बल्कि लालू और तेजस्वी यादव के जेहन में एक खौफ भी पैदा कर दिया। लोकसभा चुनाव नजदीक है, ऐसे में कई क्षेत्रीय पार्टियां एक के बाद एक विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA का साथ छोड़ रही हैं। समझिए लालू को किस बात की टेंशन है।

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नीतीश ने लालू को दिया गच्चा, अब आरजेडी का क्या होगा?

Photo : Times Now Digital

Bihar Politics: बिहार की सियासी उठापटक से लालू यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की टेंशन में सबसे ज्यादा इजाफा होना लाजमी है। दरअसल, नीतीश ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजद और कांग्रेस का साथ छोड़कर महागठबंधन को अधर में छोड़ दिया। विधानसभा में 79 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद लालू यादव एक बार फिर कुछ भी नहीं कर सके। बिहार की सरकार से उनकी पार्टी का अलग होना ही सिर्फ लालू की चिंता नहीं है, बल्कि लालू और तेजस्वी के जेहन में एक डर पनप रहा है।

लोकसभा चुनाव में लालू यादव की आरजेडी का क्या होगा?

लालू यादव और उनकी पार्टी को नीतीश ने सिर्फ झटका ही नहीं दिया, बल्कि उनका खौफ भी बढ़ा दिया, लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में जो तस्वीर देखने को मिली थी, कहीं लालू को 2024 में भी ऐसी ही हार न झेलनी पड़ जाए। पिछले आम चुनावों 2019 में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का खाता तक नहीं खुल पाया था। हालांकि इसके बावजूद 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में वो सूबे की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। अब नीतीश कुमार ने फिर पलटी मार ली है, चुनाव का समीकरण बदलना लाजमी है।

क्या फिर लालू यादव की पार्टी आरजेडी का नहीं खुलेगा खाता?

लालू यादव की सबसे बड़ी चिंता यही है कि भाजपा और नीतीश जब मिलकर लोकसभा चुनाव में ताल ठोकेंगे, तो उनके अरमानों का जनाजा निकल सकता है। 2019 में इसकी एक झलक देखने को मिली थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा पिछली बार की तुलना में और मजबूत नजर आ सकती है। इसकी वजह है राम मंदिर, कर्पूरी ठाकुर, जम्मू कश्मीर का मुद्दा... ऐसे कई मुद्दे हैं जिन्हें भाजपा इन चुनाव में जमकर भुनाएगी। 2019 में सरकार बनते ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 का खात्मा हुआ। राम मंदिर जैसे वादों को भाजपा ने पूरा किया और बिहार के कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा करते ही नीतीश ने पाला बदल लिया।

कैसे रहे 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे, समझें गणित

याद दिला दें कि पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों में आरजेडी का खाता तक नहीं खुल पाया था। बिहार की 40 सीटों पर हुए पिछले दो लोकसभा चुनावों में भाजपा का बोलबाला रहा है। 2014 के चुनावी नतीजों में भाजपा ने अकेले 22 सीटें हासिल की थी, जबकि एनडीए गठबंधन ने 31 सीटें जीती थीं। हालांकि अगर 2019 के चुनावी नतीजों का जिक्र किया जाए तो 2014 की तुलना में भाजपा को 5 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा था, मगर एनडीए गठबंधन ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर अपना कब्जा जमाया था।

नीतीश के पलटीमार ट्रैक रिकॉर्ड के चलते छवि पर पड़ा असर

कभी एनडीए, कभी महागठबंधन, तो कभी INDIA... बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब सियासी फायदे की खातिर पलटी मार लेंगे, इसका अंदाजा लगा पाना भी बिल्कुल वैसा ही है, जैसे रेत के मैदान में एक सुई को ढूंढना। लंबे वक्त तक भाजपा के साथ गठबंधन में रहने वाले नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को पानी पी-पीकर कोसा था, इसके बाद लालू की पार्टी के साथ मिलकर वो बिहार में सरकार बनाते हैं, मुख्यमंत्री बनते हैं और देखते ही देखते एक बार फिर लालू से पीछा छुड़ाकर भाजपा को गले लगा लेते हैं। 2019 का आम चुनाव एनडीए में रहते हुए लड़ते हैं। फिर 2020 का विधानसभा चुनाव भी साथ में लड़ते हैं, जिसमें उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, बावजूद इसके वो फिर से सीएम बनते हैं। मगर न जाने क्यों, नीतीश कुमार ने पलटी मार ली और फिर से लालू के साथ चले गए। अब एक फिर सीएम नीतीश ने साल 2017 वाला पलटीमार कांड दोहराया और उसी अंदाज मे लालू का साथ छोड़ भाजपा के साथ चले गए।

लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे

गठबंधनपार्टीसीटें
एनडीएभारतीय जनता पार्टी22
एनडीएलोक जनशक्ति पार्टी6
एनडीएराष्ट्रीय लोक समता पार्टी3
यूपीएराष्ट्रीय जनता दल4
यूपीएभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस2
जनता दल यूनाइटेडजद(यू)2
कोई नहींनिर्दलीय2

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे

गठबंधनपार्टीसीटें
एनडीएभारतीय जनता पार्टी17
एनडीएजदयू जनता दल यूनाइटेड16
एनडीएलोक जनशक्ति पार्टी6
महागठबंधनभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस1
महागठबंधनराष्ट्रीय जनता दल0
महागठबंधनराष्ट्रीय लोक समता पार्टी0
इन आंकड़ों को देखकर लालू भी ये समझते हैं कि भाजपा के साथ नीतीश का चुनाव लड़ना उनके लिए बेहद नुकसानदायक है। इसी वजह से लालू की चिंता बढ़ गई है कि कहीं इस बार फिर से उनकी पार्टी शून्य पर क्लीन बोल्ड ना हो जाए।

भाजपा भी समझती है नीतीश कुमार की अहमियत

इस बार भाजपा के पास खुला मैदान था, जो नीतीश-लालू-कांग्रेस के साथ आमने सामने की लड़ाई लड़ती। मगर भाजपा को ये बात अच्छे से समझ आ रहा था कि अगर ऐसा होता है तो सबसे बड़ा नुकसान बिहार में झेलना पड़ सकता है। यहां जातीय समीकरण का बोलबाला है और लालू-नीतीश की जोड़ी को मात दे पाना शायद भाजपा के लिए मामूली बात नहीं होगी। इसी लिए बिहार में भाजपा इस कोशिश में लगी थी नीतीश कुमार को अपने साथ लाया जाए। भाजपा को इस बात का एहसास था कि अगर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद बिहार में एकसाथ चुनाव लड़ते हैं, तो साल 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर 2024 के चुनाव में दिख सकता है। आपको याद दिला दें कि 2015 के नतीजों में आरजेडी को 80 सीटें, जदयू को 69 और भाजपा को सिर्फ 59 सीटें मिली थीं।

लालू का ख्वाब अब चकनाचूर हो गया है, लालू और नीतीश अगर एकसाथ मिलकर चुनाव लड़ते तो भाजपा को बिहार में बड़ी शिकस्त झेलनी पड़ सकती थी, मगर अब हार का डर लालू की आरजेडी को सता रहा है। कांग्रेस का क्या है उसने सिर्फ एक सीट जीती थी, वो भी हाथ से खिसक जाएगी तो शायद राहुल गांधी को फर्क ना पड़े, लेकिन लगातार दो चुनावों में आरजेडी का खाता नहीं खुलता लालू के लिए टेंशन की बात होगी।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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