एक्सप्लेनर्स

इंसानियत पर भारी पड़ रहा गन कल्चर: दुनिया में किस देश के पास सबसे ज्यादा बंदूकें, भारत किस नंबर पर

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated May 7, 2023, 01:48 PM IST

Gun Culture in America: अमेरिका में द गन कंट्रोल एक्ट के मुताबिक, राइफल या छोटा हथियार रखने के लिए उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। वहं हैंडगन खरीदने के लिए 21 साल उम्र का प्रावधान है। यहां 33 करोड़ की आबादी पर 39 करोड़ हथियार हैं।

Image

अमेरिका में गन कल्चर

Photo : AP

Gun Culture in America: अमेरिका में गन कल्चर काफी आम हो चुका है। कानूनी प्रावधान के मुताबिक, 18 साल अधिक उम्र का व्यक्ति बिना किसी कागजात बंदूके रख सकता है। इतना ही नहीं अमेरिका में आम लोगों को एक से एक खतरनाक बंदूके खरीदने का भी अधिकार है। यही कारण है कि यहां लगभग हर व्यक्ति के पास एक से एक खतरनाक बंदूके हैं।

अमेरिका में इस गन कल्चर को खत्म करने के लिए कानून में बदलाव की भी चर्चा हो रही है। हालांकि, कई दल इसके पक्ष में नहीं है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार को पीछे हटना पड़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में गन कल्चर युवाओं में इतना घर कर गया है कि यह देश बंदूकों के मामले में टॉप पर पहुंच गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहां प्रति 100 व्यक्तियों पर 120 बंदूके हैं।

पहले गन कल्चर की चर्चा क्यों?

अमेरिका में सामूहिक गोलीबारी की घटनाएं काफी आम हो चुकी हैं। यहां कुछ दिन पहले ही टेक्सास के स्कूल में गोलीबारी की खबर आई थी। अब बीते शनिवार को टेक्सास के एक मॉल में इसी तरह की गोलीबारी हुई, जिसमें हमलावर समेत नौ लोगों की मौत हो गई। इसके बाद एक बार फिर से गन कल्चर चर्चा में आ गया है।

अब किस देश के पास सबसे ज्यादा बंदूके

एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में एक अरब से ज्यादा बंदूके हैं। ये बंदूके न ही किसी देश की सेना या पुलिस के पास हैं, बल्कि आम नागरिकों के पास हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, आम लोगों के पास बंदूकों के मामले में अमेरिका टॉप पर है। यहां 33 करोड़ की आबादी के पास 39 करोड़ हथियार हैं। वहीं आम लोगों के पास हथियारों के मामलों में दूसरे नंबर पर भारत है। वहीं इसके बाद चीन, पाकिस्तान, रूस का नंबर है।

अमेरिका में क्या है गन एक्ट

अमेरिका में गन कल्चर सीधे संविधान से जुड़ा है। द गन कंट्रोल एक्ट के मुताबिक, राइफल या छोटा हथियार रखने के लिए उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। वहं हैंडगन खरीदने के लिए 21 साल उम्र का प्रावधान है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

और पढ़ें
End of Article