India France Weapon Deal: भारत और फ्रांस के बीच हथियारों को लेकर एक बहुत बड़ी डील होने जा रही है, यह डील बहुत बड़ी है और यह अलग तरह की है। उच्च तकनीक के लेवल पर इस तरह की डील बहुत कम देखने को सुनने को मिलती है। क्या है हथियार बेचने वाले देश अपने हथियार तो खुशी-खुशी बेच देते हैं लेकिन बात जब टीओटी यानी ट्रांस्फर ऑफ टेक्नॉलजी की आती है तो उनके हाथ-पांव फूलने लगते हैं, वे जल्दी टीओटी के लिए तैयार नहीं होते हैं लेकिन भारत अब हथियार बेचने वाले देशों से कहता है कि हमें हथियार तो चाहिए ही, हमें ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलजी भी चाहिए और मेक इन इंडिया के तहत हथियार या उपकरणों के कुछ हिस्से भारत में भी बनने चाहिए।
भारत को चाहिए पांचवीं पीढ़ी का फाइटर प्लेन
टीओटी भारत आ रही हैं, हथियार भी बन रहे हैं लेकिन कई हथियारों को लेकर पेंच अभी भी फंसा हुआ है। जैसे कि अमेरिका भारत को एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्रॉफ्ट के लिए इंजन देने वाला था, ये इंजन पांचवीं पीढ़ी वाले तेजस में लगने वाले हैं लेकिन इसमें देरी हो रही है, अमेरिका मार्च में जीई इंजन देने वाला था, मार्च से सितंबर हो गए लेकिन ये इंजन अभी तक भारत को नहीं मिले हैं, इसमें लगातार देरी हो रही है। भारत का जो एएमसीए प्रोग्राम है, उसके हिसाब से 4.5 पीढ़ी का फाइटर प्लेन 2029 तक और पांचवीं पीढ़ी का 2034 तक मिल पाएगा। चीन की तैयारियों को देखते हुए भारत तब तक इंतजार नहीं कर सकता, भारत जितना जल्दी हो सके पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स अपनी वायु सेना में शामिल करना चाहता है।
तिब्बत में चीन ने तैनात किए हैं जे-20
चीन ने अपने पांचवीं पीढ़ी के फाइटर प्लेन जे-20 तिब्बत में तैनात कर रखे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक उसके ये फाइटर LAC से महज 150 किलोमीटर की दूरी पर हैं। लड़ाकू जहाजों के लिए 100-150 किलोमीटर की दूरी कुछ नहीं होती, वे सेकेंडों में ये दूरी तय कर लेते हैं। रडार को चकमा देने में माहिर इस जेनरेशन के प्लेन जब हमला कर निकल जाते हैं, तब पता चलता है कि हमला हो गया। ऐसे में चीन पर नकेल कसने के लिए जरूरी है कि भारत के पास भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हों। फ्रांस के राफेल की जहां तक बात है तो ये 4.5 पीढ़ी के हैं और इन्हें भी स्टील्थ फीचर वाला कहा जाता है। दरअसल, हथियार आपके पास ऐसे होने चाहिए जिसके नाम से ही दुश्मन दहशत में आ जाए। उसका तोड़ उसके पास न हो। कोई गुस्ताखी करने से पहले वह सौ बार सोचे। भारत अब इसी रास्ते पर चल रहा है। टेक्नॉलजी देने में अमेरिका की हीलाहवाली और देरी से उसी को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। भारत को हथियार की अगर जरूरत है तो वह खरीदेगा, समय पर तुम अगर डिलीवरी नहीं दोगे तो किसी और से खरीद लेगा।
फ्रांस ने की है शानदार पेशकश
फ्रांस की इस बेजोड़ पेशकश की खबर ऐसे समय आई जब पीएम मोदी अमेरिका में थे और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यानी एनएसए अजीत डोभाल भारत में। लोग सवाल पूछ रहे थे कि डोभाल साहब अमेरिका क्यों नहीं गए? तो इसके पीछे की कहानी यही हो सकती है। डोभाल साहब फ्रांस के साथ इस डील को पक्की कर रहे होंगे। वह इसी डील के लिए 30 सितंबर और एक अक्टूबर को फ्रांस में होंगे। यह डील क्या है, इसके बारे में हम आपको बताते हैं। फ्रांस भारत को 110 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाले लड़ाकू विमान का इंजन देने के लिए तैयार हो गया है, वह भी 100 प्रतिशत टेक्नॉलजी ट्रांसफर के साथ। वह अंडरवाटर ड्रोन और न्यूक्लियर सबमरीन भी देने के लिए तैयार है। अब इसी डील पर मुहर लगाने के लिए एनएसए फ्रांस जाएंगे। किसी भी बड़े हथियार का 100 प्रतिशत टेक्नॉलजी ट्रांसफर करना बड़ी बात होती है, लेकिन फ्रांस इसके लिए तैयार है।
पुतिन से बात करने के लिए अमेरिका तैयार नहीं
फ्रांस और भारत की रणनीतिक साझेदारी और सहयोग एक अलग स्तर पर पहुंच रहा है। फ्रांस को लगता है कि पूरे इंडो-पेसिफिक में चीन का अगर कोई सामना कर सकता है तो वह भारत है। इसलिए, वह तकनीक और हथियार दोनों दे रहा है। अमेरिका को भी यह बात अच्छी तरह से पता है लेकिन टेक्नॉलजी के ट्रांसफर के लिए वह पूरे मन से तैयार नहीं है। दूसरा, वह भारत से ज्यादा कीमत भी वसूलने की फिराक में रहता है। यही नहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने में वह भारत की पहल का पूरी तरह से समर्थन करता है। फ्रांस भी कहता है कि युद्ध खत्म करने के लिए पुतिन से बात करनी जरूरी है। पुतिन से बात करना वाजिब भी है क्योंकि रूस ने ही यूक्रेन पर धावा बोला। ऐसे में शांति या युद्ध रोकने के लिए आपको पुतिन से बात तो करनी पड़ेगी लेकिन अमेरिका इसके लिए तैयार नहीं है। यह भी सच है कि बिना पुतिन से बात किए युद्ध रोका नहीं जा सकता। डोभाल इसी महीने रूस गए थे और पुतिन से मिलकर पीएम मोदी का पीस प्लान उन्हें दिया। अमेरिका में अपने दौरे के अंतिम दिन जेलेंस्की भी पहुंचे और उनकी मुलाकात पीएम मोदी से हुई। जाहिर है कि इस मुलाकात में युद्ध रोकने पर बात हुई होगी।
भारत अपने हित के हिसाब से करता है फैसला
युद्ध की बात हो या हथियारों की डील की, अमेरिका केवल अपने हित देखता है। युद्ध से अगर फायदा होगा तो वह यूक्रेन को पैसा और हथियार भी देगा और युद्ध से निकलना हो तो अफगानिस्तान से निकल भी जाएगा। भारत को बैकफुट पर लाने के लिए खालिस्तानियों से व्हाइट हाउस में मिल भी लेगा और गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश मामले में डोभाल पर केस भी दर्ज करा देगा। दरअसल, जिओपॉलिटिक्स में कोई किसी का स्थायी दोस्त या अस्थायी दुश्मन नहीं होता, स्थायी केवल हित होते हैं। देश अपने हितों को देखते हुए फैसले लेते हैं। भारत भी अपना हित देख रहा है। इसलिए वह फ्रांस के साथ इस डील के लिए आगे बढ़ रहा है। यह एक तरह से अमेरिका को संदेश भी है, अगर आप हथियार और टेक्नॉलजी नहीं देंगे तो कोई और देगा। आप हमें मुफ्त में कोई चीज तो दे नहीं रहे, इसके लिए मोटी रकम हम खर्च कर रहे हैं। हम हथियार के साथ टीओटी भी ले रहे हैं।
