अप्रैल की शुरुआत में बाली के उत्तर में स्थित लोंबोक जलडमरूमध्य में एक इंडोनेशियाई मछुआरे के जाल में टॉरपीडो जैसा एक अजीब उपकरण फंसा, जिस पर एक चीनी कंपनी का नाम दर्ज था। रक्षा और समुद्री विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कोई साधारण नागरिक उपकरण नहीं बल्कि समंदर के भीतर जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाला चीनी निगरानी प्लेटफॉर्म (UUV) था।
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो फिलीपींस से लेकर इंडोनेशिया तक कई देश ऐसे संदिग्ध चीनी ड्रोन्स मिलने की बात स्वीकार चुके हैं। यह घटना कोई इकलौता वाकया नहीं है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया का ध्यान यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के तनाव पर टिका हुआ है, चीन बड़ी खामोशी और चतुराई से इंडो-पैसिफिक और प्रशांत महासागर के इलाके में अपनी सैन्य ताकत का विस्तार कर रहा है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर यह भी पढ़ें: मॉस्को में 800 से ज्यादा ड्रोन अटैक, यूक्रेन ने रूस के सबसे बड़े ई-कॉमर्स गोदाम को बनाया निशाना; एक की मौत
समंदर से लेकर साइबर स्पेस तक चीन का शिकंजा
चीन का यह आक्रामक रुख सिर्फ समुद्री सीमा तक सीमित नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, ताइवान पर पिछले साल करीब 26 लाख साइबर हमले दर्ज किए गए, जो उससे पिछले साल की तुलना में दोगुने से भी अधिक हैं। इतना ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया के पास समुद्र के नीचे बिछी दो प्रमुख इंटरनेट केबल के अचानक कटने के पीछे भी चीनी हाथ होने की आशंका जताई जा रही है। दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस और जापान के गश्ती जहाजों के साथ चीनी नौसेना की तनातनी अब आम बात बन चुकी है।

(Photo: iStock)
अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने दुविधा
वैश्विक स्तर पर कई देश यह सवाल उठा रहे हैं कि संकट के समय अमेरिका उनकी रक्षा के लिए किस हद तक खड़ा रहेगा। चीन इसी संशय का फायदा उठाकर खुद को एक ऐसी महाशक्ति के रूप में पेश कर रहा है, जिसकी बढ़त को रोकना अब असंभव है। जापान की नई सरकार जहां चीन के कदमों को अपने अस्तित्व के लिए सीधा खतरा मान रही है।
वहीं ऑस्ट्रेलिया जैसे देश आलिंगन और तनातनी (Embracing while Sparring) की दोहरी नीति अपनाने पर मजबूर हैं। इसका मतलब है कि वे चीन से व्यापारिक रिश्ते भी बनाए रखना चाहते हैं और अपनी सुरक्षा की किलेबंदी भी कर रहे हैं।
टाइम्स नाउ नवभारत पर यह भी पढ़ें: तारिक रहमान के भारत दौरे से पहले ढाका ने रखी बड़ी शर्त, कहा- शेख हसीना का प्रत्यर्पण करे भारत
रणनीतिक स्थिरता की खिड़की और भविष्य की चुनौती
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि वाशिंगटन और बीजिंग दोनों ही फिलहाल एक सीमित 'रणनीतिक स्थिरता' के दौर से गुजर रहे हैं। दोनों देश एक-दूसरे पर अपनी आर्थिक और तकनीकी निर्भरता कम करने की कोशिश में जुटे हैं। हालांकि, पश्चिमी रक्षा और टेक कंपनियां अब भी चीनी कलपुर्जों और रेयर अर्थ मिनरल्स पर काफी हद तक निर्भर हैं। चीन एआई (AI) तकनीक से लेकर मिसाइल परीक्षणों तक हर मोर्चे पर अपनी बढ़त कायम कर रहा है।
साफ है कि दुनिया का ध्यान भले ही कहीं और भटका हो, लेकिन बीजिंग बिना किसी शोर-शराबे के अपनी सैन्य और आर्थिक रणनीति को अंजाम दे रहा है। आने वाले वर्षों में वैश्विक पटल पर जो भी नेतृत्व उभरेगा, उसे एक कहीं ज्यादा मजबूत, साधन संपन्न और आक्रामक चीन की चुनौतियों से निपटना होगा।
वैश्विक संतुलन और भारत की रणनीतिक तैयारी
चीन की यह बढ़ती आक्रामकता सिर्फ प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हिंद महासागर और भारत की समुद्री सीमाओं पर भी पड़ रहा है। 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति के तहत ड्रैगन जिस तरह श्रीलंका, म्यांमार और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों में अपने पैर पसार रहा है, वह पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है।
इस बहुआयामी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने भी अपनी रणनीतिक बिसात मजबूत करनी शुरू कर दी है। 'क्वाड' (Quad) गठबंधन के जरिए भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बनाए रखने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, जिस रफ्तार से चीन समंदर से लेकर स्पेस तक अपनी सैन्य और साइबर क्षमता का विस्तार कर रहा है, उसे देखते हुए लोकतांत्रिक देशों को और अधिक ठोस रणनीति अपनानी होगी।
