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पाकिस्तान की राह पर बांग्लादेश, संविधान से सेक्युलर 'शब्द' हटाने की मांग...क्या बनने जा रहा एक और इस्लामिक देश? भारत के लिए चिंता क्यों

Bangladesh Secular or Islamic: बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के गिरने और सत्ता में मोहम्मद युनुस के आने के बाद हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2 अगस्त के बाद से अब तक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के 2000 से ज्यादा मामले सामने आए हैं। बांग्लादेश 2022 में हुई जनगणना के अनुसार, देश की जनसंख्या करीब 16.5 करोड़ है। इसमें मुस्लिम आबादी की जनसंख्या 91.04 फीसदी है। 7.95 फीसदी में हिंदू, बौद्ध, ईसाई आबादी है।

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इस्लामिक देश बनने जा रहा बांग्लादेश?

Bangladesh Secular or Islamic: बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के साथ ही हिंदुओं पर हमले बढ़ गए हैं। बीते दिनों ऐसी कई घटनाएं सामने आईं, जिसमें हिंदू परिवारों को निशाना बनाया गया। मामला इतना बढ़ गया कि भारत को बांग्लादेश की नई सरकार से हिंदुओं की सुरक्षा की अपील करनी पड़ी। लेकिन मामला इतना भर नहीं है। बांग्लादेश को पाकिस्तान की तरह इस्लामिक देश बनाने की तैयारी चल रही है। संविधान से सेक्युलर और समाजवाद जैसे शब्द हटाने की वकालत शुरू हो गई है।

बांग्लादेश के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्जमां ने देश के संविधान से सेक्युलर और समाजवाद जैसे शब्द हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि बांग्लादेश की 90 फीसदी आबादी मुस्लिम है, लिहाजा संविधान से सेक्युलर शब्द हटा देना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने शेख मुजीबुर रहमान का राष्ट्रपिता का दर्जा खत्म करने की भी मांग की है।

आइए जानते हैं बांग्लादेश को अचानक सेक्युलर शब्द से आपत्ति क्यों हुई? बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी कितनी है? यहां के संविधान में हिंदुओं के लिए क्या अधिकार तय किए हैं? इस्लामिक देश बनने से भारत पर इसका कितना असर पड़ेगा...?

पहले पूरा मामला समझिए

बांग्लादेश की अदालत में एक याचिका दाखिल की गई थी। इसमें साल 2011 में शेख हसीना सरकार द्वारा किए गए 15वें संविधान संशोधन को चुनौती दी गई थी। इस संशोधन के जरिए बांग्लादेश के संविधान में 'सेक्युलरिज्म' शब्द को शामिल किया गया था। इसके अलावा संशोधनों में धर्मनिरपेक्षता को बहाल करना, चुनाव की निगरानी के लिए कार्यवाहक सरकार प्रणाली को समाप्त करना, संविधानेतर तरीकों से सत्ता संभालना और शेख मुजीबुर रहमान को राष्ट्रपिता का दर्जा देना शामिल था।

बांग्लादेश में किसकी-कितनी आबादी

बांग्लादेश 2022 में हुई जनगणना के मुताबिक, देश की जनसंख्या करीब 16.5 करोड़ है। इसमें मुस्लिम आबादी की जनसंख्या 91.04 फीसदी है। 7.95 फीसदी में हिंदू, बौद्ध, ईसाई आबादी है। वहीं अन्य समुदायों की आबादी 1 फीसदी के करीब है। बांग्लादेश के संविधान के अनुसार, सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार प्राप्त हैं।

क्या है संविधान संशोधन की प्रक्रिया?

बांग्लादेश के संविधान को 4 नवंबर 1972 को अपनाया गया था। संविधान के मुताबिक, राष्ट्रवार, समाजवाद, लोकतंत्र और सेक्युलरिज्म को देश का उच्च आदर्श माना गया है। संविधान में प्रतिज्ञा की गई है कि लोकतांत्रित प्रक्रिया के जरिए देश में समाजवादी और शोषण से मुक्त समाज का निर्माण मूल अवधारणा होगी। संविधान में किसी भी प्रावधान को संविधान संशोधन के जरिए ही बदला जा सकता है। इस संशोधन के लिए इसे बांग्लादेश की संसद के दो-तिहाई बहुमत से पारित करना जरूरी है। एक बार पारित होने के बाद विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजे जाने का प्रावधान है।

हिंदुओं पर हमले और भारत के लिए चिंता

बांग्लादेश एक मुस्लिम बहुल राष्ट्र है। यहां हिंदुओं पर हमले कोई नई बात नहीं है। हालांकि, शेख हसीना सरकार के गिरने और सत्ता में मोहम्मद युनुस के आने के बाद हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2 अगस्त के बाद से अब तक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के 2000 से ज्यादा मामले सामने आए हैं। ऐसे में पड़ोसी देश होने के नाते भारत की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। वहीं, अगर बांग्लादेश के संविधान में संशोधन होता है और वह इस्लामिक राज्य बनता है तो पाकिस्तान की तरह भारत के पड़ोस में एक और दूसा देश खड़ा हो जाएगा।

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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