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अतीक हो गया 'अतीत': आज ही सुपुर्द-ए-खाक हुआ था बेटा असद, शाम होते-होते अतीक का भी हो गया अंत; पढ़ें इनसाइड स्टोरी

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 16, 2023, 11:37 AM IST

Atique Ahmed Death News in Hindi: बेटे के इनकाउंटर का गम अभी भरा भी नहीं था कि शाम होते-होते अतीक और उसके काले साम्राज्य का भी अंत हो गया। जानकारी के मुताबिक, प्रयागराज में पुलिस के सामने ही अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या कर दी गई। यह हत्या तब हुई, जब दोनों मेडिकल परीक्षण से लाए जा रहे थे।

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बेटे असद के इनकाउंटर के बाद अतीक और अशरफ की हत्या।

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

Atique Ahmed Death News in Hindi: अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या की इनसाइड स्टोरी काफी रोमांचक है। दो दिन पहले (13 अप्रैल) ही उसके बेटे असद और शूटर मोहम्मद गुलाम का यूपी एसटीएफ ने इनकाउंटर किया था। शनिवार सुबह बेटे असद का शव प्रयागराज पहुंचा था और उसे सुपुर्द-ए-खाक किया गया था। माफिया अतीक को अपने बेटे के जनाजे में न जा पाने का मलाल था, लेकिन यह मलाल अतीक के साथ अतीत में बदल गया।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया था कि अतीक और उसका भाई अशरफ बेटे असद के जनाजे में जाना चाहते थे। दोनों ने यूपी पुलिस से वहां ले चलने के लिए गुहार भी लगाई थी। हालांकि, इजाजत नहीं मिली और असद को उसके परिवार वालों ने दफना दिया। आगे पढ़ें असद से लेकर अतीक और अशरफ की इनसाइड स्टोरी...

13 को झांसी में हुआ था असद का इनकाउंटर

उमेश पाल हत्याकांड में अतीक का बेटा असद और मोहम्मद गुलाम आरोपी थे। दोनों इस हत्याकांड के बाद फरार चल रहे थे, जिन्हें पकड़ने के लिए पुलिस ने दोनों के सिर पर पांच-पांच लाख रुपये का इनाम भी रखा था। 12 अप्रैल को यूपी एसटीएफ को इस हत्याकांड के दोनों अभियुक्तों असद और मोहम्मद गुलाम के झांसी या उसके आसपास के इलाके में छिपे होने की खबर मिली। जानकारी के मुताबिक, दोनों के झांसी के चिरगांव कस्बे में होने की जानकारी मिली, यहां से दोनों एक बाइक पर सवार होकर परीक्षा की तरफ जा रहे थे। इसके बाद एसटीएफ की दो टीमें इन दोनों को पकड़ने के लिए अलग-अलग रवाना हुईं। इसी दौरान परीछा बांध के मोड़ पर एसटीएफ से असर और गुलाम का आमना सामना हुआ। दोनों को सरेंडर करने को कहा गया, लेकिन उन्होंने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में दोनों मारे गए।

आज ही बेटा हुआ सुपुर्द-ए-खाक

उमेश पाल हत्याकांड में अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन भी फरार चल रही है। लिहाजा असद का शव लेने के लिए न ही अतीक पहुंच पाया और न ही उसकी मां शाइस्ता। परिवार के अन्य सदस्यों ने असद का शव लिया और उसे शनिवार सुबह प्रयागराज में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। बेटे असद के जनाजे में अतीक को न पहुंच पाने का गम था। वहां जाने के लिए उसने यूपी पुलिस के सामने गुहार भी लगाई थी।

शाम होत-होते अतीक हो गया अतीत

बेटे के इनकाउंटर का गम अभी भरा भी नहीं था कि शाम होते-होते अतीक और उसके काले साम्राज्य का भी अंत हो गया। जानकारी के मुताबिक, प्रयागराज में पुलिस के सामने ही अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या कर दी गई। यह हत्या तब हुई, जब दोनों मेडिकल परीक्षण से लाए जा रहे थे। दोनों मीडिया से बातचीत कर रहे थे, तभी तीन हथियार बंद बदमाशों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। अतीक के हत्यारों की पहचान कर ली गई है। उनकी पहचान अरुण मौर्या, नवीन तिवारी और सोनू के रूप में हुई है।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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