Madhya Pradesh Elections Results 2023: मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2023 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत के असल नायक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बनकर उभरे हैं। ऐसा तब हुआ जब उन्हें पार्टी की ओर से इस बार सीएम फेस के तौर पर नहीं पेश किया था। फिर भी मामा कहलाने वाले सूबे के इस दिग्गज नेता ने सबसे लंबे समय लगभग पौने 17 साल तक लगातार मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने का इतिहास रच दिया। वह सबसे लंबे समय तक बीजेपी से सीएम रहे हैं। वह इस बार छठवीं बार सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा सीट जीते हैं। सीनियर बीजेपी नेता इसके अलावा विदिशा लोकसभा सीट से वर्ष 1991 से वर्ष 2006 तक पांच बार लगातार सांसद भी रहे हैं।
64 बरस के नेता ने सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए 'लाडली बहना' सरीखी गेम-चेंजर योजना शुरू करके प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया था, जो कि नतीजों के बाद बहुत हद तक सफल मालूम पड़ता है। किसान परिवार में जन्में चौहान को सफल प्रशासक के साथ ही बेहद विनम्र और मिलनसार नेता के रूप में पहचाना जाता है। म.प्र में तो उनका निक नेम (प्यार से बुलाया जाने वाला नाम) मामा है। वह महिलाओं और बेटियों के बीच भी इसी नाम से बेहद लोकप्रिय हैं, जबकि मुख्यमंत्री बनने से पहले अपनी लोकसभा सीट विदिशा में अमूमन पैदल चलने के कारण वह ‘पांव-पांव वाले भैया’ के नाम से पुकारे जाते थे। आइए, जानते हैं उनके बारे में:

mp results 2023
सीहोर के जैत गांव में पांच मार्च 1959 को किसान प्रेम सिंह चौहान और सुंदर बाई चौहान के यहां जन्में चौहान में नेतृत्व का हुनर सबसे पहले तब दिखा था जब वह 1975 में मॉडल हायर सेकेण्डरी स्कूल के छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे। संगीत, अध्यात्म, साहित्य और घूमने-फिरने में उनकी खास रुचि है। घर में पत्नी साधना सिंह हैं और उनके दो बेटे (कार्तिकेय और कुणाल) हैं। कार्तिकेय कारोबारी हैं, जबकि कुणाल अभी अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। शिवराज की शैक्षणिक योग्यता कला संकाय से स्नातकोत्तर है। वह 1972 में 13 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संपर्क में आए और 1975 में आपातकाल के आंदोलन में भाग लिया और भोपाल जेल में निरूद्ध रहे। भाजपा युवा मोर्चा (भाजयुमो) के प्रांतीय पदों पर रहते हुए उन्होंने विभिन्न छात्र आंदोलनों में भी हिस्सा लिया था।

Shivraj Singh Chouhan as 'Mama'
उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री के बतौर 29 नवंबर 2005 को पहली बार शपथ लेने वाले चौहान लगातार दूसरी बार 2008 में और तीसरी बार 2013 में भी मुख्यमंत्री बने और दिसंबर 2018 तक मुख्यमंत्री रहे। आगे वह 23 मार्च 2020 को चौथी बार मुख्यमंत्री बने थे। चौहान 1990 में पहली बार बुधनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे। फिर 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से उन्होंने लखनऊ सीट को रखा था और विदिशा से इस्तीफा दे दिया था। विदिशा में पार्टी ने शिवराज को प्रत्याशी बनाया और वह वहां से पहली बार सांसद बने।
चौहान 1991-92 में अखिल भारतीय केसरिया वाहिनी के संयोजक और 1992 में अखिल भारतीय जनता युवा मोर्चा के महासचिव बने। 1992 से 1994 तक भाजपा के प्रदेश महासचिव नियुक्त होने के साथ ही वह 1992 से 1996 तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति, 1993 से 1996 तक श्रम और कल्याण समिति तथा 1994 से 1996 तक हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य रहे। 1996 में वह विदिशा संसदीय क्षेत्र से दोबारा सांसद चुने गए। सांसद के रूप में 1996-97 में वह नगरीय और ग्रामीण विकास समिति, मानव संसाधन विकास विभाग की परामर्शदात्री समिति तथा नगरीय एवं ग्रामीण विकास समिति के सदस्य रहे। 1998 में वह विदिशा संसदीय क्षेत्र से ही तीसरी बार बारहवीं लोकसभा के सदस्य चुने गए।
चौहान 1998-99 में प्राक्कलन समिति के सदस्य रहे। 1999 में वह विदिशा से लगातार चौथी बार तेरहवीं लोकसभा के लिए एक बार फिर चुने गए और 1999-2000 में कृषि समिति के सदस्य तथा 1999-2001 में सार्वजनिक उपक्रम समिति के सदस्य रहे। साल 2000 से 2003 तक भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने पार्टी की युवा इकाई को मजबूत करने के लिए मेहनत की। इस दौरान वे सदन समिति (लोकसभा) के अध्यक्ष और भाजपा के राष्ट्रीय सचिव भी रहे। वह 2000 से 2004 तक संचार मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य रहने के साथ ही पांचवीं बार विदिशा से चौदहवीं लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।
वह 2004 में कृषि समिति, लाभ के पदों के विषय में गठित संयुक्त समिति के सदस्य, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, भाजपा संसदीय बोर्ड के सचिव, केन्द्रीय चुनाव समिति के सचिव और नैतिकता विषय पर गठित समिति के सदस्य और लोकसभा की आवास समिति के अध्यक्ष रहे।
वर्ष 2005 में चौहान मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष नियुक्त किए गए और उन्हें 29 नवंबर 2005 को उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान सौंपी गई। (पीटीआई-भाषा इनपुट्स के साथ)
