Bihar Election 2025: पूर्णिया जिले की बनमनखी विधानसभा सीट (Banmankhi constituency) अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है। यहां दलित और पिछड़ा वर्ग के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय भी संख्या के लिहाज से प्रभावी है। यही वजह है कि इस सीट पर सामाजिक समीकरण और स्थानीय उम्मीदवार की लोकप्रियता दोनों का समान असर देखा जाता है।
इस सीट का राजनीतिक इतिहास
1962 में गठित इस विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास दिलचस्प रहा है। एक समय कांग्रेस और वामदलों का प्रभाव था, लेकिन 2000 के बाद भाजपा ने धीरे-धीरे इस सीट को अपने मजबूत गढ़ में बदल दिया। पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री ने भी यहां से राजनीति की नींव रखी थी। 2020 में भाजपा के कृष्ण कुमार ऋषि ने राजद उम्मीदवार उपेन्द्र शर्मा को करीब 27,700 वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी।
2025 के मुख्य उम्मीदवार और चुनावी मुकाबला
इस बार भाजपा ने एक बार फिर अपने मौजूदा विधायक कृष्ण कुमार ऋषि पर भरोसा जताया है। पार्टी को उम्मीद है कि उनकी सक्रियता और संगठनात्मक मजबूती के सहारे सीट पर बढ़त बरकरार रहेगी। वहीं, कांग्रेस ने देव नारायण राजक को मैदान में उतारा है, जो दलित समाज से आते हैं और जमीनी स्तर पर अच्छी पकड़ रखते हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सुबोध पासवान को उम्मीदवार बनाया है, जो सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। इसके अलावा कुछ स्थानीय निर्दलीय उम्मीदवार भी मुकाबले में हैं, जो बाढ़ और बेरोजगारी जैसे स्थानीय मुद्दों पर प्रचार कर रहे हैं।
विकास के मुद्दे और मतदाताओं की अपेक्षाएं
बनमनखी एक ग्रामीण और कृषि प्रधान इलाका है, जहां बाढ़, सड़क कनेक्टिविटी, रोजगार और पलायन जैसे विषय हमेशा चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे हैं। भाजपा विकास और सरकारी योजनाओं को अपना मुख्य हथियार बना रही है, जबकि विपक्ष इन योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल उठा रहा है। मतदाताओं का मूड फिलहाल विकास और स्थानीय नेतृत्व की कार्यशैली पर टिका है।
क्या है भाजपा की रणनीति?
भाजपा अपने कोर वोट बैंक, विशेषकर दलित और युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश में है। वहीं, कांग्रेस और बसपा जातीय गठजोड़ के सहारे मैदान में उतर रही हैं। अगर विपक्षी मतों का बिखराव नहीं हुआ, तो मुकाबला रोचक बन सकता है। बूथ स्तर पर संगठन और उम्मीदवार की स्थानीय छवि इस बार जीत-हार की कुंजी साबित होगी।
बनमनखी सीट पर इस बार मुकाबला त्रिकोणीय होता दिख रहा है। भाजपा अपने परंपरागत गढ़ को बचाने में जुटी है, जबकि कांग्रेस और बसपा नई उम्मीदों के साथ मैदान में हैं। जातीय संतुलन और विकास का एजेंडा — यही तय करेगा कि बनमनखी की जनता किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है।
