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मुख्यमंत्री : बिहार का नौवां CM, गांधी का 'सरदार'; जो 71 साल की उम्र में बना सूबे का सिरमौर

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर पूरे राज्य में माहौल गर्मा चुका है। 6 व 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान और 14 नवंबर 2025 को मतगणना की घोषणा के बाद, बिहार राजनीति का केंद्र बन गया है। तमाम राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर रहे हैं। इस बीच हम आपके लिए अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों पर एक सीरीज लेकर आए हैं। इस सीरीज के तहत आज नौवें मुख्यमंत्री सरदार हरिहर सिंह के बारे में जानें -

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बिहार के 9वें मुख्यमंत्री 'सरदार' हरिहर सिंह

कहानी तो ये बिहार के नौवें मुख्यमंत्री की है। लेकिन गांधी के 'सरदार', बात इसी से शुरू करते हैं। कहानी उस समय की है, जब देश में स्वाधीनता का आंदोलन चल रहा था। साल 1920 की बात है। 4 सितंबर 1920 को महात्मा गांधी आरा, सतपहाड़ी में आए थे। उनके साथ खिलाफत आंदोलन वाले मौलाना शौकत अली और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अबुल कलाम आजाद भी थे। आसपास के इलाकों से सैकड़ों की संख्या में लोग गांधी जी और कांग्रेस नेताओं से मिलने पहुंचे। इसी भीड़ में दो नवयुवक हरिहर सिंह और रघुवंश भी थे। महात्मा गांधी ने इन युवकों से बातचीत और इस संवाद से महात्मा गांधी काफी प्रसन्न हुए। जाते-जाते महात्मा गांधी ने इन दोनों से जो शब्द कहे, वह शब्द उनके नाम के साथ सदा के लिए जुड़ गए। गांधी बोले- आज से तुम दोनों के ऊपर इस इलाके की जिम्मेदारी है, तुम दोनों यहां के 'सरदार' हो। बस फिर क्या था हरिहर सिंह और रघुवंश के नाम में हमेशा के लिए सरदार जुड़ गया। यही हरिहर सिंह आगे चलकर बिहार के नौवें मुख्यमंत्री बने। चलिए उनके बारे में विस्तार से जानते हैं -

हरिहर सिंह का प्रारंभिक जीवन

हरिहर सिंह को बिहारी जी सिंह के नाम से भी जाना जाता था। इसलिए याद रखें कि कई जगहों पर उन्हें बिहारी जी के नाम से संबोधन किया जाता रहा है और हमारी इस कॉपी में भी इस नाम का जिक्र होगा। हरिहर सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत में बिहार और उड़ीसा प्रांत के चौंगाई गांव में एक राजपूत परिवार में साल 1898 में हुआ था। हालांकि, कुछ जगहों पर उनका जन्म वर्ष 1900 और 1925 भी बताया जाता है। उन्होंने आरा के जिला स्कूल पढ़ाई की और पढ़ाई के दौरान ही आजादी की लड़ाई से जुड़ गए। यहां तक कि पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन का नारा बुलंद करने लगे।

राजनीतिक करियर

सरदार हरिहर सिंह का राजनीतिक करियर उस समय शुरू हुआ, जब वह सासाराम अनुमंडल विधानसभा से चुने गए। इसके बाद साल 1946 में वह आरा सदर और आजादी के बाद पहले विधानसभा चुनाव यानी 1952 में डुमरांव से कांग्रेस की टिकट पर विधायक चुने गए। साल 1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन विधान परिषद के लिए चुन लिए गए। 1967 के विधानसभा चुनाव में वह डुमरांव से ही निर्दलीय विधायक चुने गए। 1969 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर उन्हें कांग्रेस से टिकट मिली और बिहार के मुख्यमंत्री बने।

मुख्यमंत्री बने गांधी के 'सरदार'

1969 के चुनाव में जीत मिलने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर बड़ी माथापच्ची हुई। 8 दिनों के डेडलॉक के बाद आखिरकार कांग्रेस ने सरदार हरिहर सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। 7 मार्च 1969 को सरदार हरिहर सिंह ने 71 साल की उम्र में 11 मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन शपथ ग्रहण के शाम से ही बवाल भी शुरू हो गया। इसके बावजूद सीएम हरिहर सिंह की सरकार चलती रही और जून में उनके मंत्रीमंडल में 17 अन्य मंत्रियों को शामिल किया गया। मुख्यमंत्री के विरोधी खेमे के दरोगा प्रसाद राय और बालेश्वर राम को भी कैबिनेट में जगह दी गई। लेकिन विभागों का बंटवारा किसी सिरदर्द से कम नहीं था। हुआ ये कि मुख्यमंत्री सहित कैबिनेट में कुल 29 मंत्री थे, लेकिन विभाग सिर्फ 7 मंत्रियों को ही बंटे थे। इसी दौरान विधानसभा सत्र भी चल रहा था और इसी सत्र में हरिहर सिंह की मुख्यमंत्री की कुर्सी खिसक गई। आगे की कहानी जानने से पहले जान लेते हैं हरिहर सिंह के शपथग्रहण से पहले वो 8 दिन की माथापच्ची क्या थी

शपथ से पहले वो 8 दिन की वो माथापच्ची

1969 के मध्यावधि चुनाव में भी किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। विपक्ष में आम सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस तुरंत एक्शन में आयी और उसने अन्य दलों को साथ लेकर मिलकर सरकार बनाने की कवायद शुरू की। कांग्रेस ने तत्कालीन गृहमंत्री और महाराष्ट्र के कद्दावर नेता वाई.बी चव्हाण को पटना भेज दिया। वह आए तो पर्यवेक्षक बनकर थे, लेकिन उनका असली काम कांग्रेस के लिए राज्य में बहुमत जुटाना था। कांग्रेस के बार बहुमत से 42 विधायक कम थे और यह काम चव्हाण के लिए भी आसान नहीं था। उन्होंने सतेंद्र नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिन्हां को इशारा किया। बस इन दोनों ने राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह की जनता पार्टी और जगदेव प्रसाद के शोषित दल सहित कुछ निर्दलीयों को अपने पाले में ले लिया। मुख्यमंत्री के तौर पर चव्हाण की पसंद सरदार हरिहर सिंह थे, लेकिन विरोधी गुट ने एक अन्य कांग्रेस नेता दरोगा प्रसाद राय का नाम उछाल दिया। अब हरिहर सिंह और दरोगा प्रसाद राय के बीच चुनाव की बात कही जाने लगी। इस बीच कद्दावर कांग्रेस नेता चव्हाण ने अपनी बाजी चली और गैर कांग्रेसी नेताओं से सरदार हरिहर सिंह के नाम का दबाव डलवाया। कहा गया कि बहुमत सिर्फ कांग्रेस का नहीं सहयोगी दलों की मंशा से चलेगा और आखिरकार सरदार हरिहर सिंह के नाम पर मुहर लग गई।

117 दिन में ही गिर गई हरिहर सिंह की सरकार

हुआ ये कि पशुपालन विभाग के लिए पूरक अनुदान प्रस्ताव सदन के पटल पर रखा गया। दरअसल बजट में निर्गत राशि के अलावा किसी विभाग में अतिरिक्त पैसे की जरूरत पड़ती है तो पूरक अनुदान प्रस्ताव लाया जाता है। आमतौर पर तो ऐसे प्रस्ताव को ध्वनिमत से मंजूरी मिल जाती है। लेकिन हरिहर मंत्रीमंडल के कुछ नाराज मंत्रियों ने वोटिंग की मांग कर दी। विपक्ष को तो जैसे मुह मांगी मुराद मिल गई और उन्होंने भी तुरंत सरकार के नाराज मंत्रियों के सुर में सुर मिला दिया। फिर क्या था, वोटिंग हुई और पूरक अनूदान को मंजूरी का प्रस्ताव गिर गया। यानी हरिहर सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। मुख्यमंत्री का कहना था कि पूरक प्रस्ताव मनी बिल है और इसमें सदन में हार का सरकार अल्पमत में है और उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन उनके संरक्षक सत्येंद्र नारायण और महेंद्र प्रसाद सिन्हा के अनुसार सप्लीमेंट्री ग्रांट पर वोटिंग के नतीजे के आधार पर इस्तीफे की आवश्यकता नहीं थी। दो दिन तक हरिहर सिंह ने भी काफी सोचा और आखिर 22 जून 1969 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वह कुल 117 दिन तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।

भोजपुरी कवि हरिहर सिंह

सरदार हरिहर सिंह एक भोजपुरी कवि थे। उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों से ओत-प्रोत देशभक्ति की अनेक भोजपुरी कविताएं भी लिखीं। उनके जीवन की शुरुआत संघर्षों के साथ हुई थी और अंत भी संघर्षों के बीच ही हुआ। वह कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन संपत्ति नहीं बना पाए और उल्टा चुनाव खर्च में उनकी पैतृक संपत्ति भी बिक गई। 1977 में उन्होंने भी इंदिरा गांधी द्वारा देश में इमरजेंसी लगाने के खिलाफ जनता पार्टी से चुनाव लड़ा और हार गए। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया और आखिर 1988 में उनका निधन हो गया।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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