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Kakori Train Action क्या है? जिसने अंग्रेजों के शासन को हिलाकर रख दिया था

काकोरी कांड, जिसका नाम उत्तर प्रदेश सरकार ने अमर बलिदानियों के सम्मान में आधिकारिक तौर बदलकर 'Kakori Train Action' किया, वह है क्या? स्वतंत्रता संग्राम में इसका क्या महत्व रहा है। आइए आज इस घटना की वर्षगांठ पर इसके बारे में विस्तार से जानें।

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Kakori Train Action क्या है (Photo - AI)

Kakori Train Action: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त 1925 का दिन अदम्य साहस, वीरता और स्वाभिमान के स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। जी हां, यह वही दिन है, जब लखनऊ के पास स्थित काकोरी नामक स्थान पर साहसी क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के सरकारी खजाने से भरी ट्रेन को लूटकर ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। इस ऐतिहासिक घटना को भारतीय इतिहास में 'काकोरी कांड' या 'काकोरी ट्रेन एक्शन' के नाम से जाना जाता है।

बता दें कि यह केवल ट्रेन से धन लूटने की साधारण घटना नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय युवाओं द्वारा छेड़ी गई सीधी जंग का ऐलान था। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के वीर सेनानियों ने इस कदम के जरिए यह साबित कर दिया था कि भारत की आजादी के लिए देश का युवा किसी भी सीमा तक जा सकता है। यह घटना केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और इतिहास के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह यूपीएससी, एसएससी और कई प्रतियोगिता परीक्षाओं और इंटरव्यू के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। तो आइए आज आपको काकोरी कांड के बारे में विस्तार से बताएं कि कैसे इसने आजादी की लड़ाई पर गहरा प्रभाव डाला।

क्या था काकोरी कांड का मुख्य उद्देश्य

1920 के दशक की शुरुआत में महात्मा गांधी द्वारा अचानक असहयोग आंदोलन वापस लिया गया था। इससे देश के युवाओं में भारी निराशा छा गई थी। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद और सचिंद्रनाथ सान्याल जैसे कई उत्साही युवाओं का मानना था कि महात्मा गांधी के अहिंसक रास्तों के साथ-साथ अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए सशस्त्र क्रांति की भी आवश्यकता है। इसी सोच के साथ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) की स्थापना की गई। हालांकि, संगठन को चलाने, हथियार खरीदने, पर्चे छपवाने और अपने साथियों को कानूनी मदद पहुंचाने के लिए पैसों की भी सख्त जरूरत थी।

हथियारों और अन्य कार्य के लिए पैसे जुटाने के लिए शुरुआत में क्रांतिकारियों ने कुछ भारतीय धनिकों के घर डकैती डाली, लेकिन उन्हें अहसास हुआ कि अपने ही देशवासियों का धन लूटना नैतिक रूप से बिल्कुल सही नहीं है। इसके बाद राम प्रसाद बिस्मिल ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया, जिसमें उन्होंने केवल अंग्रेजों के सरकारी खजाने को ही निशाना बनाने का फैसला लिया, जो वास्तव में भारतीय जनता से ही वसूला गया टैक्स था।

क्या है काकोरी घटना की पूरी कहानी

8 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक हुई, जिसमें ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूटने की पूरी योजना तैयार की गई। 9 अगस्त 1925 की शाम को, '8 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर' ट्रेन शाहजहांपुर से लखनऊ की ओर बढ़ रही थी। जैसे ही ट्रेन लखनऊ से लगभग 14 किलोमीटर दूर काकोरी रेलवे स्टेशन के पास पहुंची, क्रांतिकारियों ने इमरजेंसी चेन खींचकर ट्रेन को रोक दिया।

ट्रेन रुकते ही क्रांतिकारियों ने गार्ड के डिब्बे को घेर लिया और सरकारी तिजोरी को नीचे उतार लिया। तिजोरी बहुत मजबूत थी और उसे तोड़ना आसान नहीं था, लेकिन अशफाक उल्ला खां और उनके साथियों ने लोहे के हथौड़े से भारी मशक्कत के बाद तिजोरी को तोड़ डाला। उन्होंने वहां से लगभग 4,600 रुपये का सरकारी खजाना अपने कब्जे में लिया और सुरक्षित निकल भागे। पूरी घटना के दौरान क्रांतिकारियों का उद्देश्य केवल सरकारी धन छीनना था, किसी यात्री को नुकसान पहुंचाना नहीं।

इस मिशन में शामिल 10 क्रांतिकारी कौन थे?

राम प्रसाद बिस्मिल
अशफाक उल्ला खां
चंद्रशेखर आजाद
राजेंद्र नाथ लाहिड़ी
रोशन सिंह
शचिंद्रनाथ बख्शी
केशव चक्रवर्ती
बनवारी लाल
मुकुंदी लाल
मन्मथनाथ गुप्त

अंग्रेजों की बौखलाहट और मुकदमे का दमन चक्र

इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को एकदम स्तब्ध कर दिया। एक संगठित क्रांतिकारी दल द्वारा सरकारी खजाने पर इस तरह का सीधा हमला अंग्रेजी हुकूमत के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। इस घटना से बौखलाई ब्रिटिश पुलिस ने पूरे उत्तर प्रदेश में दमन चक्र चलाया और HRA के सदस्यों की गिरफ्तारी शुरू की। अंग्रेज सरकार ने लगभग 40 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। हालांकि, चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गिरफ्त में कभी नहीं आए और वे हमेशा आजाद ही रहे। गिरफ्तार किए गए क्रांतिकारियों पर लखनऊ की अदालत में ऐतिहासिक 'काकोरी षड्यंत्र केस' (Kakori Conspiracy Case) चलाया गया। देश के जाने-माने वकीलों ने क्रांतिकारियों की पैरवी की, लेकिन ब्रिटिश सरकार उन्हें कड़ी से कड़ी सजा देने पर आमादा थी।

अमर शहीदों का बलिदान

काकोरी केस के मुकदमे की सुनवाई के बाद अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इसमें चार प्रमुख क्रांतिकारियों राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी की सजा सुनाई गई।

राम प्रसाद बिस्मिल19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई
अशफाक उल्ला खां19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद (अब अयोध्या) जेल में फांसी दी गई
ठाकुर रोशन सिंह19 दिसंबर 1927 को नैनी (इलाहाबाद) जेल में फांसी दी गई
राजेंद्रनाथ लाहिड़ीउन्हें निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व ही 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में फांसी दे दी गई

इनके अलावा सचिंद्रनाथ सान्याल और शचिंद्रनाथ बख्शी को काला पानी (अंडमान) की सजा सुनाई गई, जबकि अन्य साथियों को 5 से 14 वर्ष तक की कठोर कारावास की सजा मिली।

काकोरी क्रांति का ऐतिहासिक महत्व

काकोरी कांड ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को एक नई ऊर्जा और दिशा दी थी। यह घटना सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल बना। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की अटूट दोस्ती ने देश में हिंदू-मुस्लिम एकता का एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे अंग्रेज कभी तोड़ नहीं पाए। इस घटना और शहीदों के बलिदान ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद HRA का पुनर्गठन करके 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) बनाया गया।

काकोरी कांड स्वतंत्रता संग्राम का अहम कड़ी

काकोरी कांड अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ भारत के वीर सपूतों का एक ऐतिहासिक प्रतिरोध था। इन शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देशवासियों को यह संदेश दिया कि आजादी से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इन अमर बलिदानियों के सम्मान में आधिकारिक तौर पर इसका नाम बदलकर 'काकोरी ट्रेन एक्शन' (Kakori Train Action) कर दिया है।

Varsha Kushwaha
वर्षा कुशवाहाauthor

वर्षा कुशवाहा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की एजुकेशन डेस्क पर बतौर कॉपी एडिटर कार्यरत हैं और पिछले 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं। जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूज रूम में तेजी, सटीकता और गहराई के साथ काम करते हुए अपनी मजबूत संपादकीय पहचान बनाई है। वर्षा की विशेषज्ञता हाइपर-लोकल खबरों, इवेंट कवरेज और स्टेट पॉलिटिक्स से जुड़ी रिपोर्टिंग में भी है। अब तक वर्षा कुशवाहा 8,000 से अधिक खबरें लिख चुकी हैं, जिनमें कई अहम लोकल रिपोर्ट्स, एजुकेशन और करियर की खबरें तथा फीचर-आधारित स्टोरीज शामिल हैं।

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