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प्रताप नारायण मिश्र कौन थे? उन्हें हिंदी खड़ी बोली का उन्नायक क्यों कहा गया, पढ़ें उनकी जीवनी

Pratap Narayan Mishra Ka Jivan Parichay: हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रताप नारायण मिश्र का नाम भारतेंदु युग के प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाता है। वे कवि, निबंधकार, नाटककार, पत्रकार और संपादक थे, जानें उन्हें हिंदी खड़ी बोली का उन्नायक क्यों कहा गया?

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प्रताप नारायण मिश्र कौन थे? (Image- AI Generated/Newsroom Verified)

Pratap Narayan Mishra Ka Jivan Parichay: हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रताप नारायण मिश्र का नाम भारतेंदु युग के प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाता है। वे कवि, निबंधकार, नाटककार, पत्रकार और संपादक थे। हिंदी गद्य को आम लोगों की बोलचाल की भाषा के करीब लाने और खड़ी बोली को आगे बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने अपनी रचनाओं में सरल भाषा के साथ मुहावरों और कहावतों का खूब इस्तेमाल किया।

प्रताप नारायण मिश्र का जन्म और मृत्यु

प्रताप नारायण मिश्र का जन्म 24 सितंबर 1856 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बैजे गांव में हुआ था। उनके पिता संकटाप्रसाद प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। शुरुआती पढ़ाई के बाद मिश्र जी का मन पारंपरिक शिक्षा से ज्यादा साहित्य की ओर लगने लगा। उन्होंने स्वाध्याय के जरिए अपनी साहित्यिक प्रतिभा को निखारा। प्रताप नारायण मिश्र भारतेंदु हरिश्चंद्र से काफी प्रभावित थे। वे उनके विचारों और लेखन से प्रेरणा लेते थे। साल 1883 में उन्होंने 'ब्राह्मण' नाम की मासिक पत्रिका शुरू की, जिसके जरिए उन्होंने साहित्य के साथ सामाजिक और देश से जुड़े मुद्दों पर भी लिखा।

6 जुलाई 1894 को कानपुर में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र केवल 38 वर्ष थी।

प्रताप नारायण मिश्र की प्रसिद्ध रचनाएं

प्रताप नारायण मिश्र ने कविता, निबंध और नाटक सहित साहित्य की कई विधाओं में लिखा। उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में 'प्रेम पुष्पांजलि', 'मन की लहर', 'लोकोक्तिशतक', 'कानपुर महात्म्य', 'प्रताप लहरी' और 'ब्रैडला स्वागत' शामिल हैं। उनके प्रमुख नाटकों में 'कलि-कौतुक', 'हठी हमीर', 'भारत दुर्दशा', 'दूध का दूध पानी का पानी' और 'जुआरी-खुआरी' के नाम मिलते हैं।

उन्हें हिंदी खड़ी बोली का उन्नायक क्यों कहा गया?

प्रताप नारायण मिश्र ने उस दौर में ऐसी हिंदी का इस्तेमाल किया, जो आम लोगों की बोलचाल से जुड़ी हुई थी। उनकी भाषा में खड़ी बोली के साथ तद्भव और तत्सम शब्दों के अलावा उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी के प्रचलित शब्द भी मिलते हैं। मुहावरों और कहावतों के कारण उनकी भाषा सहज और प्रभावशाली बन गई। इसी वजह से हिंदी गद्य को सरल और जनभाषा के करीब लाने तथा खड़ी बोली के विकास में योगदान देने वाले साहित्यकारों में प्रताप नारायण मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

Neelaksh Singh
नीलाक्ष सिंहauthor

नीलाक्ष सिंह 2021 से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से जुड़े हैं और एजुकेशन सेक्शन के लिए कंटेंट लिखते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने प्रिंट मीडिया में इंटर्नशिप की, जहां फील्ड रिपोर्टिंग, स्टूडेंट-इश्यू बेस्ड ग्राउंड स्टोरीज और सटीक न्यूजराइटिंग की बुनियादी समझ हासिल की। प्रिंट के बाद डिजिटल मीडिया में भी वह एजुकेशन बीट पर ही लगातार काम करते रहे हैं। पत्रकारिता में 10 सालों से सक्रिय नीलाक्ष सिंह 12 हजार से अधिक खबरें लिख चुके हैं। वह एग्जाम अपडेट्स, एडमिशन प्रोसेस, करियर गाइडेंस, स्टूडेंट वेलफेयर, बोर्ड रिजल्ट्स और नीतिगत बदलावों पर गहन और बेहद उपयोगी कंटेंट तैयार करते हैं।

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