NEET Counseling 2026: मेडिकल की पढ़ाई करने और डॉक्टर बनने का सपना देख रहे लाखों युवाओं के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट (NEET) अपने सपने को पूरा करने के लिए पहला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। अक्सर उम्मीदवारों को लगता है कि यदि परीक्षा में उनके नंबर अच्छे आ गए हैं, तो उन्हें अपने पसंदीदा और देश के टॉप मेडिकल कॉलेज में सीट आसानी से मिल जाएगी। लेकिन, वास्तविक स्थिति इससे काफी अलग होती है।
आपको बता दें कि नीट परीक्षा में महज अच्छे अंक लाना किसी मेडिकल कॉलेज में दाखिले की गारंटी नहीं देता है। कई टॉप स्कोर करने वाले उम्मीदवारों तक को अपनी पसंद का कॉलेज नहीं मिल पाता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि काउंसलिंग और एडमिशन प्रक्रिया के दौरान कटऑफ का गणित आसान नहीं है, यह बहुत ही पेचीदा और कई महत्वपूर्ण कारकों यानी फैक्टर्स पर निर्भर करता है। नीट काउंसलिंग शेड्यूल घोषित होने से पहले यदि छात्र कटऑफ और सीट अलॉटमेंट के इस पूरे तंत्र को सही तरीके से समझ लें, तो वे अपने प्राप्त अंकों के आधार पर एक व्यावहारिक लक्ष्य तय कर सकते हैं और एडमिशन के समय होने वाली किसी भी हड़बड़ी से बच सकते हैं। लेकिन सवाल काउंसलिंग में चॉइस फिल करने का नहीं है, बल्कि यह जानना है कि मेडिकल कॉलेजों की कट-ऑफ किन फैक्टरों के आधार पर तैयार की जाती है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें -कंपाउंडर का बेटा बनेगा डॉक्टर: पिता को क्लिनिक में काम करते देख लिया संकल्प, पहली बार में पास की नीट परीक्षा
नीट के बाद कटऑफ का क्या मतलब होता है?
नीट रिजल्ट जारी होने के बाद 'कटऑफ' वह न्यूनतम क्वालीफाइंग स्कोर होता है, जो MBBS, BDS या अन्य आयुष मेडिकल कोर्सेज में प्रवेश पाने के लिए आवश्यक माना जाता है। देश के सभी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश की प्रक्रिया नीट रिजल्ट के बाद जारी कट-ऑफ के आधार पर ही पूरी की जाती है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
क्वालीफाइंग कटऑफ (Qualifying Cut-off): यह नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा घोषित किया गया न्यूनतम परसेंटाइल होता है, जिसे हासिल करने पर उम्मीदवार को नीट परीक्षा में सफल या 'क्वालिफाईड' माना जाता है।
एडमिशन कटऑफ (Admission Cut-off): काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान किसी विशेष मेडिकल कॉलेज में सीट पाने के लिए यह कटऑफ तय होती है। इसमें यह तय किया जाता है कि उम्मीदवार को सरकारी मेडिकल कॉलेज में जगह मिलेगी या उसे प्राइवेट कॉलेज/डीम्ड यूनिवर्सिटी का रुख करना पड़ेगा। एडमिशन कट-ऑफ कॉलेज और कोर्स में सीट की उपलब्धता पर तय की जाती है।

NEET Counseling 2026 (Photo - Canva)
इन 5 फैक्टर से तय होती है कटऑफ
नीट यूजी परीक्षा में हर साल लाखों अभ्यर्थी शामिल होते हैं। नीट काउंसलिंग 2026 से पहले यह जानना बेहद जरूरी है कि किसी भी साल मेडिकल कॉलेज की कटऑफ किन 5 मुख्य बातों पर निर्भर करती है -
पहला फैक्टर - परीक्षा में शामिल और क्वालीफाई करने वाले उम्मीदवारों की संख्या
परीक्षा देने वाले और उसमें सफल होने वाले छात्रों की कुल संख्या सीधे तौर पर कटऑफ को प्रभावित करती है। जी हां, यदि उच्च स्कोर करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या बढ़ती है, तो सीमित सरकारी सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ जाती है, जिसके चलते कटऑफ स्कोर भी ऊपर चला जाता है।
दूसरा फैक्टर - प्रश्न-पत्र का कठिनाई स्तर
नीट परीक्षा के प्रश्न-पत्र का स्तर एक निर्णायक भूमिका निभाता है। यदि पेपर आसान आता है, तो औसतन छात्रों के अंक ज्यादा आते हैं, जिससे कटऑफ ऊपर जाती है। वहीं, यदि पेपर कठिन होता है, तो औसतन स्कोर घटने के कारण कटऑफ भी नीचे आ जाती है।
तीसरा फैक्टर - सीटों की कुल उपलब्धता
देश भर के सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में MBBS और BDS की कुल कितनी सीटें उपलब्ध हैं, यह कटऑफ तय करने में काफी अहम है। AIIMS और JIPMER जैसे देश के टॉप मेडिकल कॉलेजों में सीटें सीमित होती है, यही कारण है कि इन संस्थानों की कट-ऑफ अन्य मेडिकल कॉलेज की तुलना में सबसे अधिक होती है।
चौथा फैक्टर - रिजर्वेशन पॉलिसी और कैटेगरी
देश की आरक्षण व्यवस्था के तहत अलग-अलग वर्गों के लिए अलग-अलग कटऑफ तय की जाती है। सामान्य यानी जनरल वर्ग की कटऑफ आमतौर पर सबसे ज्यादा होती है, जबकि OBC, SC, ST और EWS श्रेणियों के अभ्यर्थियों को आरक्षण व्यवस्था के नियमों के अनुसार छूट मिलने से उनके लिए कटऑफ तुलनात्मक रूप से कम रहती है।
पांचवां फैक्टर - AIQ और राज्य कोटा काउंसलिंग
इसमें काउंसलिंग दो स्तरों पर आयोजित की जाती है, जिसमें पहला है ऑल इंडिया कोटा और दूसरा है राज्य कोटा। इसमें 15% ऑल इंडिया कोटा (AIQ) होता है, जिसमें देश भर के छात्र प्रतिस्पर्धा करते हैं, इसलिए यहां कटऑफ का स्तर काफी अधिक होती है। वहीं 85% राज्य कोटा होता है। इसमें संबंधित राज्य के मूल निवासियों को प्राथमिकता मिलती है, जिस कारण इसकी कटऑफ आमतौर पर ऑल इंडिया कोटे से थोड़ी कम रहती है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें - देश में MBBS की कितनी सीटें उपलब्ध हैं? जानें कितने फेज में होगी NEET काउंसलिंग प्रक्रिया
NEET काउंसलिंग के दौरान ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें
नीट काउंसलिंग प्रक्रिया काफी संवेदनशील होती है। इस दौरान फॉर्म भरते हुए जरा सी लापरवाही से अच्छी रैंक होने के बावजूद उम्मीदवारों को हाथों से उनकी पसंदीदा सीट निकल जाती है। इसलिए उन्हें कुछ विशेष बातों का ध्यान रखने की आवश्यकता है -
हर राउंड के बदलाव पर नजर रखें: काउंसलिंग के पहले, दूसरे और मॉप-अप राउंड में सीटों की स्थिति बदलती रहती है। कुछ छात्र अपनी आवंटित सीट छोड़ देते हैं या बेहतर कॉलेज मिलने पर अपग्रेड का विकल्प चुनते हैं।
कॉलेज और कोर्स की प्राथमिकता: अपनी रैंक और पिछले सालों के ट्रेंड्स का विश्लेषण करके ही कॉलेजों की प्राथमिकता सूची भरें।
दस्तावेजों की तैयारी: अपने सभी आवश्यक प्रमाण पत्र जैसे 10वीं-12वीं की मार्कशीट, नीट एडमिट कार्ड, स्कोरकार्ड, जाति प्रमाण पत्र, डोमिसाइल आदि, पहले से तैयार रखें ताकि वेरिफिकेशन के दौरान उन्हें किसी प्रकार की दिक्कत का सामना न करना पड़े और किसी भी डॉक्यूमेंट की कमी के कारण उनका एडमिशन रद्द न होए।
आधिकारिक वेबसाइट्स पर अपडेट रहें: मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) और अपने राज्य की संबंधित काउंसलिंग अथॉरिटी की आधिकारिक वेबसाइट को लगातार चेक करते रहें।
