Bashir Badr: उर्दू शायरी की दुनिया के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का निधन हो गया है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनकी गजलें और शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में” और “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा” जैसे उनके कई शेर लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि डॉ. बशीर बद्र सिर्फ एक लोकप्रिय शायर ही नहीं, बल्कि एक विद्वान शिक्षाविद, आलोचक और प्रोफेसर भी थे। उनका शैक्षणिक जीवन भी उतना ही प्रेरणादायक था, जितनी उनकी शायरी।
देश की इस मशहूर यूनिवर्सिटी से की थी पढ़ाई
डॉ. बशीर बद्र ने अपनी ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई Aligarh Muslim University (AMU) से पूरी की थी। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उर्दू साहित्य और गजलों में गहरी रुचि हो गई थी। साहित्य को गहराई से समझने की इसी चाह ने उन्हें रिसर्च की ओर बढ़ाया।
1973 में जमा की थी PhD थीसिस
उन्होंने “आजादी के बाद की गजल का तनकीदी मुताला” विषय पर अपनी पीएचडी की थीसिस तैयार की थी। यह शोध उर्दू गजल की आलोचनात्मक समझ पर आधारित था। डॉ. बशीर बद्र ने अपनी यह थीसिस वर्ष 1973 में AMU में जमा की थी।

Bashir Badr
शायर के साथ प्रोफेसर भी
शायरी में पहचान बनाने से पहले डॉ. बशीर बद्र विश्वविद्यालय में उर्दू पढ़ाते थे। बाद में वे Meerut College के उर्दू विभाग के अध्यक्ष (HOD) भी बने। वे सिर्फ साहित्य लिखते ही नहीं थे, बल्कि उसे पढ़ाने और समझाने का काम भी करते थे।
46 साल बाद मिली PhD की डिग्री
डॉ. बशीर बद्र की जिंदगी से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि थीसिस जमा करने के बाद वे मुशायरों और अध्यापन में इतने व्यस्त हो गए कि अपनी PhD की डिग्री लेने कभी नहीं पहुंचे। बाद में उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र की कोशिशों के बाद AMU ने वर्ष 2021 में, करीब 46 साल बाद उनकी PhD की डिग्री डाक के जरिए भेजी।
पद्मश्री से हो चुके थे सम्मानित
उर्दू गजल को आम लोगों की भावनाओं से जोड़ने वाले डॉ. बशीर बद्र को साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था।
