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एक फोर्ट कहलाता है 'किलों का रत्न' तो दूसरा 'जमीन का जेवर', जानें इनकी खासियत

इतिहास के पन्नों में भारत के किले वीरता, शौर्य और कला के अद्भुत उदाहरण के रूप में चमकते हैं। ये किले सिर्फ युद्ध की गाथाओं का प्रतीक नहीं, बल्कि उस समय की संस्कृति और जीवनशैली का भी आईना हैं। कुछ किले अपनी विशिष्ट खूबसूरती और महत्व के कारण ‘किलों का रत्न’ या ‘जमीन का जेवर’ जैसे खास नामों से भी जाने जाते हैं। ऐसे में आइए जानें इनके बारे में।

Meet Kilon ka Ratna and Zameen ka Jewar Forts of India

मिलिए 'किलों का रत्न' और 'जमीन का जेवर' से

Photo : iStock

भारत के इतिहास पर अगर गौर फरमाएं, तो यह वीरता, शौर्य और स्थापत्य कला के अद्भुत उदाहरणों से भरा हुआ है। देश के कोने-कोने में फैले भव्य किले न केवल तत्कालीन राजाओं की शक्ति और समृद्धि को दर्शाते हैं, बल्कि उस दौर की संस्कृति, रणनीति और जीवनशैली की झलक भी पेश करते हैं। इन किलों से जुड़ी असंख्य कहानियां, युद्ध गाथाएं और लोककथाएं आज भी लोगों की जिज्ञासा को जगाती हैं और इतिहास प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

भारत के कई किले अपनी अनोखी बनावट, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार किए गए निर्माण के लिए जाने जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में कुछ ऐसे खास किले भी मौजूद हैं, जिन्हें उनकी खूबियों के कारण ‘किलों का रत्न’ और ‘जमीन का जेवर’ जैसे नामों या निकनेम से पुकारा जाता है? ये नाम केवल प्रशंसा के लिए नहीं दिए गए, बल्कि इनके पीछे गहरा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य महत्व छिपा हुआ है। आज हम आपको इसी के बारे में बताने जा रहे हैं। तो चलिए जानें....

Kilon ka Ratna

किलों का रत्न

किस किले को कहा जाता है ‘किलों का रत्न’?

सबसे पहले उस किले के बारे में जानते हैं जिसे ‘किलों का रत्न’ कहा जाता है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में स्थित ग्वालियर किला इस उपाधि से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर ने इस किले की भव्यता से प्रभावित होकर इसे ‘हिंद के किलों के हार का मोती’ कहा था। बाबर की इस प्रशंसा के बाद ग्वालियर किले की ख्याति और भी बढ़ गई।

क्यों कहा जाता है ‘किलों का रत्न’?

ग्वालियर किले को ‘किलों का रत्न’ कहे जाने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। यह किला विंध्य पर्वत श्रृंखला की गोपाचल पहाड़ी पर स्थित है। माना जाता है कि इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में राजा सूरजसेन ने करवाया था। यह किला जमीन से लगभग 300 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ है, जिससे इस पर आक्रमण करना बेहद कठिन था। इसी वजह से इसे लंबे समय तक अभेद्य किला माना गया। जहां भारत के अधिकतर किले लाल बलुआ पत्थर या धूसर पत्थरों से निर्मित हैं, वहीं ग्वालियर किले की खासियत इसकी रंगीन टाइलें हैं। यहां लाल, नीली, हरी और पीली रंग की टाइलों पर सुंदर कलाकृतियां बनी हुई हैं। हैरानी की बात यह है कि सदियों बाद भी इन टाइलों की चमक बरकरार है।

Zameen Ka Jewar

जमीन का जेवर

किस किले को कहा जाता है ‘जमीन का जेवर’?

अब बात करते हैं उस किले की जिसे ‘जमीन का जेवर’ कहा जाता है। राजस्थान के बीकानेर में स्थित जूनागढ़ किला इस नाम से जाना जाता है। आमतौर पर राजस्थान में सुरक्षा के लक्ष्य से अधिकतर किलों का निर्माण अरावली पर्वत की पहाड़ियों पर किया गया है, जैसे चितौड़गढ़ और कुंभलगढ़ के किले। लेकिन जूनागढ़ किला इससे बिल्कुल अलग है, क्योंकि यह किसी पहाड़ी पर नहीं, बल्कि समतल भूमि पर बना हुआ है। इस किले की सुरक्षा के लिए चारों ओर गहरी खाई बनाई गई थी, जिसे युद्ध के समय पानी से भर दिया जाता था। इसकी भव्य शिल्पकला और आकर्षक बनावट इसे जमीन पर सजे हुए आभूषण जैसा रूप देती है, इसी कारण इसे ‘जमीन का जेवर’ कहा जाता है।

इस पत्थर से हुआ है किले का निर्माण?

जूनागढ़ किले के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग किया गया है। इन पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी इतनी सुंदर है कि देखने पर यह पत्थर नहीं, बल्कि लकड़ी की नक्काशी जैसी प्रतीत होती है। यही कलात्मकता इस किले को विशेष बनाती है। यह किला अपने समय में रेगिस्तानी क्षेत्र में स्थित था, इसलिए गर्मी के मौसम में ठंडक और बारिश का आभास कराने के लिए यहां बादल महल का निर्माण किया गया। इस महल में बिजली चमकने और बारिश के दृश्य चित्रों के जरिए दर्शाए गए हैं। इसके अलावा अनूप महल भी खास आकर्षण है, जहां सोने की कलम से की गई सजावट देखने को मिलती है।

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 Nilesh Dwivedi
Nilesh Dwivedi author

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अप... और देखें

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