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सलीमगढ़ फोर्ट कहां है, इसे मुगलों ने नहीं तो फिर किसने बनाया? जानें पूरी कहानी

सलीमगढ़ किला दिल्ली के समृद्ध इतिहास और भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख प्रतीक है। इस किले का निर्माण 1546 में किया गया था। किला मुगल काल में सत्ता संघर्ष, कैद और राजनीति का केंद्र रहा। 1857 की क्रांति और आजाद हिंद फौज से जुड़ाव के कारण यह आजादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण बना रहा।

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यहां जानें सलीमगढ़ किले को किसने बनवाया

दिल्ली दिलवालों की है और अगर दिल्ली के इतिहास में झांकेंगे तो यह मुगलों व अंग्रेजों की है। दिल्ली में खिलजी, तुगलक, गुलाम वंश, सूर वंश, चौहान वंश जैसे कई वंशों ने सदियों तक राज किया। लाल किला से लेकर कुतुब मीनार और इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक आज भी दिल्ली में गुलामी के दौर की तमाम निशानियां मौजूद हैं। दिल्ली में पुराने किले से लेकर फिरोजशाह कोटला का किला और लाल किला तक यमुना किनारे बसाए गए। इसी तरह यमुना किनारे एक और किला बसा है, जिसका नाम सलीमगढ़ है। क्या आप जानते हैं कि सलीमगढ़ का किला कहां है और इसे किसने बनाया? चलिए जानते हैं -

सलीमगढ़ किला अपने में दिल्ली के समृद्ध इतिहास को समेटे हुए है। यह किला लाल किला के उत्तर-पूर्वी छोर पर मौजूद है और यह लाल किला से भी पुराना है। आज सलीमगढ़ किले के बारे में ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं। जबकि इसका भारत की आजादी की लड़ाई में भी काफी योगदान है।

सलीमगढ़ किले का बहादुर शाह गेट

सलीमगढ़ किले को अपनी भव्य और मजबूत वास्तुकला के लिए जाना जाता है। इसे किले को त्रिकोणीय आकार में बनाया गया है। कभी यह एक महत्वपूर्ण सैन्य दुर्ग था, जिसे नियमित अंतराल पर गोल बुर्जों से मजबूती दी गई। मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के शासनकाल में बना एक मेहराबदार पुल सलीमगढ़ किले को लाल किले से जोड़ता है। किले का मुख्य प्रवेश द्वार साधारण बनावट का है, जिस पर हल्के रूप से लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इस गेट को ‘बहादुर शाह गेट’ कहा जाता है और आज भी इतिहास की गौरवशाली गाथा बयान करने को स्थिर खड़ा है। लेकिन इस किले को किसी मुगल बादशाह ने नहीं बनवाया।

Salimgarh Fort.

यमुना किनारे बनाया गया सलीमगढ़ किला

मुगलों ने नहीं तो किसने बनाया सलीमगढ़ किला

सलीमगढ़ किले का निर्माण साल 1546 में शेर शाह सूरी के बेटे सलीम शाह सूरी ने करवाया था। उस समय इस किले को बनाने का उद्देश्य क्षेत्र को संभावित हमलों से बचाना था। आपको ज्ञात होगा कि 1540 में शेर साह सूरी ने मुगल सम्राट हुमायूं को हरा दिया था और दिल्ली पर सूरी वंश का शासन स्थापित किया था। हार के बाद हुमायूं फारस यानी पर्सिया (आज के ईरान) चला गया था। यमुना नदी और अरावली की पहाड़ियों के बीच बनाया गया यह मजबूत किला रणनीतिक लिहाज से काफी अहम था। साल 1555 में किले का निर्माण कार्य पूरा होने से पहले ही सलीम शाह सूरी की मृत्यु हो गई। सलीम शाह के राज में यहां पर एक मस्जिद और आसपास की दीवार का ही निर्माण कार्य पूरा हो पाया था।

हुमायूं की वापसी और सलीमगढ़ किला

1555 में हुमायूं फारस से वापस लौटा। सूरी वंश के अंतिम शासक सिकंदर शाह सूरी को हराकर हुमायूं ने एक बार फिर मुगल साम्राज्य को स्थापित किया। हुमायूं ने सलीमगढ़ किले पर कब्जा कर लिया और उसका नाम 'नूरगढ़' रख दिया। माना जाता है कि हुमायूं के बेटे मुगल बादशाह अकबर ने एक मुगल सरदार फरीद बुखारी को यह किला जागीर के रूप में दे दिया था। कई मुगल बादशाह इस सलीमगढ़ किले में रहे, विशेषरूप से शाहजहां का नाम लिया जा सकता है, जो अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लाए और किला-ए-मुबारक बनने से पहले सलीमगढ़ किले में ही रहे।

बता दें कि शाहजहां जब अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लाए तो उन्होंने यमुना नदी के किनारे शाहजहांनाबाद नाम का शहर बसाया। यहां पर शाहजहां ने किला-ए-मुबारक भी बनाया, जिसे आज हम सब लाल किला के नाम से जानते हैं। शाहजहां ने किला-ए-मुबारक का निर्माण इसी सलीमगढ़ किले के पास करवाया।

Salimgarh Fort Jail.

औरंगजेब और अंग्रेजों ने सलीमगढ़ किले को बनाया जेल

औरंगजेब ने बेटी, भाई और अन्य को यहीं कैद किया

बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब ने सलीमगढ़ किले को जेल के रूप में इस्तेमाल किया। कहा जाता है कि यहीं पर औरंगजेब ने अपने सबसे छोटे भाई मुराद बख्श और बेटी जेबुन्निसा को कैद किया था। बाद में मुराद बख्श को ग्वालियर ले जाया गया और मार दिया गया। जेबुन्निसा ने अपने जीवन के अंतिम 21 साल इसी सलीमगढ़ किले की कैद में काटे। साल 1659 में औरंगजेब के सिपाहियों ने उसके बड़े भाई और शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह व उसके छोटे बेटे सिफिर शिकोह को गिरफ्तार किया और सलीमगढ़ किले में कैद कर लिया। साल 1712-13 में मुगल बादशाह जहांदर शाह को भी इसी किले में कैद किया गया था। यह भी माना जाता है कि अफगान रोहिल्ला प्रमुख गुलाम कादिर रोहिल्ला ने शाह आलम को सलीमगढ़ किले में कैद कर लिया था। बाद में मराठा शासक महादजी सिंधिया ने शाह आलम को मुक्त कराया।

आजादी की लड़ाई का केंद्र बना सलीमगढ़ किला

1857 में जब आजादी की पहली लड़ाई हुई, उस समय सलीमगढ़ किला स्वतंत्रता और विद्रोह का केंद्र बन गया। 1857 की क्रांति के समय आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने यहीं से अपनी गतिविधियां संचालित कीं। क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया और सलीमगढ़ उस दौर में रणनीति और प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र बना। क्रांतिकारी युद्ध की रणनीति तय करने के लिए सलीमगढ़ किले में इकट्ठा होते थे। आखिर अंग्रेजों ने क्रांति को दबा दिया और सलीमगढ़ किले को अपने कब्जे में लेकर इसे आर्मी कैम्प व जेल के रूप में इस्तेमाल किया।

1940 के दशक तक भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद सरकार और इंडियन नेशनल आर्मी का गठन हुआ और ब्रिटिश सेना के खिलाफ युद्ध छेड़ा गया। 1945 में आईएनए के कई सैनिकों को सलीमगढ़ किले में कैद कर यातनाएं दी गईं। यह किला स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना।

Salimgarh Fort wall.

सलीमगढ़ किले ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई

स्वतंत्रता सेनानी स्मारक

इंडियन नेशनल आर्मी से जुड़े ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए साल 1995 में सलीमगढ़ किले को भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के स्मारक में बदलकर 'स्वतंत्रता सेनानी स्मारक' नाम दिया गया। कभी दमन का प्रतीक रहा यह किला स्वतंत्रता संघर्ष की गौरवगाथा का प्रतीक बन गया। कर्नल प्रेम कुमार की वर्दी, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों के जूते व कोट के बटन और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दुर्लभ तस्वीरें अब यहां की विरासत हैं।

कैसे पहुंचे सलीमगढ़ किला

सलीमगढ़ किला जाने का प्लान बना रहे हैं तो बता दें कि यह लाल किला के पास ही है। दरियागंज या राजघाट की तरफ से यहां जाना हो तो यह पुराने लोहे के पुल के पास है, जहां तक बसें और ऑटो आपको आसानी से मिल जाएंगे। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन कश्मीरी गेट, दिल्ली गेट और जामा मस्जिद हैं।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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