जनता दल (यूनाइटेड) में बगावत के सुर आक्रामक होते तब दिखाई दिए, जब असंतुष्ट नेता उपेंद्र कुशवाहा ने सबके सामने अपना हिस्सा मांग लिया। उन्होंने मंगलवार (31 जनवरी, 2023) को अपनी इस बगावत की तुलना उस चुनौती से की जो बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने तीन दशक पहले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू प्रसाद को दी थी।
जद(यू) संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष कुशवाहा ने कहा कि कुमार के लिए उनके मन में ‘अगाध श्रद्धा’ है, लेकिन जोर दिया कि वह (नीतीश) अपने निर्णय नहीं ले पा रहे हैं, जिसकी वजह से जद (यू) कमजोर हो गई है। मुझे यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया कि पार्टी में अपने हिस्से का दावा करने से मेरा क्या मतलब है। मैं आज वह कर रहा हूं।
बकौल कुशवाहा, ‘‘मैं उसी हिस्से की बात कर रहा हूं जो नीतीश कुमार ने साल 1994 की प्रसिद्ध रैली में मांगा था जब लालू प्रसाद हमारे नेता को उनका हक देने से हिचक रहे थे।’’
वह (कुशवाहा) पटना में हुई ‘लव कुश’ रैली का जिक्र कर रहे थे, जिसका मकसद बिहार में यादव जाति के राजनीतिक वर्चस्व में पीछे छूटे कुर्मी-कोइरी जाति के लोगों को एकजुट करना था। रैली में कुमार की मौजूदगी ने अविभाजित जनता दल से उनके अलग होने और एक स्वतंत्र राजनीतिक यात्रा की रूपरेखा तय की थी।
वह आगे बोले, ‘‘मैं अतीत में राज्यसभा छोड़ चुका हूं और केंद्रीय मंत्रिपरिषद से भी हट गया था...अगर उन्हें लगता है कि ये मेरे लिए बड़े विशेषाधिकार हैं तो पार्टी मेरे सभी पद वापस ले सकती है और विधान परिषद सदस्य का दर्जा भी छीन सकती है।’’
कुशवाहा ने आगे दावा किया कि 2013 के विपरीत जब जद (यू) ने पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से नाता तोड़ा था, ‘‘बिखराव का खतरा अब हमारी पार्टी पर मंडरा रहा है।’’
