बिहार की राजनीति में इस समय उपेंद्र कुशवाहा चर्चा में हैं। चर्चा में इसलिए क्योंकि कयास लगाए जा रहे हैं कि वो बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। हाल ही में वो मेडिकल चेक अप के लिए दिल्ली में जब थे तो बीजेपी के कुछ नेताओं के साथ उनकी तस्वीर सामने आई थी। उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि बात का बतंगड़ बनाया जा रहा है। लेकिन क्या बात इतनी सी भर है। अब जबकि बिहार के सीएम नीतीश कुमार भी कह चुके हैं कि जिसको जहां जाना हो जा सकता है तो कुशवाहा भी चुप नहीं रहे। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि बड़ा अच्छा कहा भाई साहब आपने..ऐसे बड़े भाई के कहने से छोटा भाई घर छोड़कर जाने लगे तो हर बड़का भाई अपने छोटका भाई को घर से भगाकर बाप-दादा की पूरी संपत्ति अकेले हड़प ले। ऐसे कैसे चले जाएं अपना हिस्सा छोड़कर..
कुशवाहा का जेडीयू से मोहभंग
अब सवाल यह है कि उपेंद्र कुशवाहा क्या चाहते हैं। दरअसल उन्होंने खुद कहा कि जो लोग उनके मामले में बीजेपी के गलबहियां का आरोप मढ़ रहे हैं वो लोग क्या कर रहे हैं। हकीकत तो यह है कि जेडीयू के बड़े नेता खुद बीजेपी के संपर्क में हैं। वो नीतीश कुमार को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि खतरा किनसे हैं और उनसे सतर्क रहने की जरूरत है। लेकिन क्या बात इतनी सी भर है। सवाल यह है कि सियासी मौसम को परख कर फैसला करने वाले कुशवाहा को अब यकीन होने लगा है कि जेडीयू में अब उनके राजनीतिक हित उतने महफूज नहीं है। या यूं कहें तो जिस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने 2018 में बीजेपी से नाता तोड़ा था उसका पूरा होना असंभव है।
क्या कहते हैं जानकार
बिहार की राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि 2025 में तेजस्वी यादव की अगुवाई में चुनाव लड़ने वाला बयान कुशवाहा को रास नहीं आया। वो इस बात को समझ गए कि बिहार की सबसे बड़ी कुर्सी पर उनका दावा कमजोर होगा। लिहाजा वो रास्ता तलाशने लगे। बिहार के राजनीतिक समीकरण में ना तो अब उन्हें जेडीयू सूट कर रही है और ना ही आरजेडी। लिहाजा उन्हें ऐसा लग रहा है कि राजनीतिक वजूद को बनाए रखने के लिए बीजेपी ही बेहतर विकल्प है। हालांकि अभी वो इस बात को लेकर संशय में हैं कि बीजेपी का हिस्सा बनना बेहतर होगा या अपनी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी को पुनर्गठित कर आगे बढ़ना होगा। बिहार की मौजूदा राजनीति समीकरण में बीजेपी को सामाजिक स्तर पर अपने गठबंधन को मजबूत करना होगा जिसके लिए जातीय समूहों का नेतृत्व करने वाले दल अगर उसके साथ आते हैं तो उससे बेहतर क्या हो सकता है। उपेंद्र कुशवाहा जिस समाज से आते हैं उस समाज का बिहार में करीब 3 फीसद आबादी है। और यह संख्या सत्ता में ए, बचे, बने और आगे बढ़ने के लिए जरूरी है।
