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Mumbai 26/11: ऐसा जांबाज सिपाही जिसने लाठी से किया AK-47 का मुकाबला...छलनी होता गया शरीर, लेकिन आतंकी कसाब को नहीं छोड़ा

1954 में महाराष्ट्र में जन्मे ओंबले ने 1991 में मुंबई पुलिस में शामिल होने से पहले भारतीय सेना के सिग्नल कोर में नायक के रूप में देश की सेवा की। अपने अनुशासन और शांत समर्पण के लिए जाने जाने वाले वे ASI के पद तक पहुंचे और डी बी मार्ग पुलिस स्टेशन में तैनात हुए।

Tukaram

मुंबई हमले में तुकाराम ने कसाब को जिंदा पकड़ा। तस्वीर-PTI

Tukaram Omble: भारत 26/11 मुंबई आतंकी हमलों की एक और बरसी मना रहा है, ऐसे में देश असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर तुकाराम गोपाल ओंबले को याद कर रहा है, जो मुंबई पुलिस के वो ऑफिसर थे जिनकी 26 नवंबर 2008 की रात को दिखाई गई जबरदस्त हिम्मत ने जांच का रास्ता हमेशा के लिए बदल दिया। 1954 में महाराष्ट्र में जन्मे ओंबले ने 1991 में मुंबई पुलिस में शामिल होने से पहले भारतीय सेना के सिग्नल कोर में नायक के रूप में देश की सेवा की। अपने अनुशासन और शांत समर्पण के लिए जाने जाने वाले वे ASI के पद तक पहुंचे और डी बी मार्ग पुलिस स्टेशन में तैनात हुए।

गिरगांव चौपाटी पर आतंकवादियों को रोका

हमलों वाली रात पुलिस कंट्रोल रूम को अलर्ट मिला कि दो भारी हथियारों से लैस लोग CST पर आने-जाने वालों पर गोलियां चला रहे हैं, तब ओंबले और उनकी टीम को गिरगांव चौपाटी पर रोडब्लॉक करने भेजा गया। आतंकवादी एक हाईजैक की गई स्कोडा में सवार होकर, रात 10 बजे के कुछ देर बाद चेकपॉइंट के पास पहुंचने लगे।

जब पुलिस सामने थी तो आतंकियों गाड़ी की हाई-बीम हेडलाइट्स और विंडशील्ड वाइपर चालू कर दिए ताकि दिखाई न दे। ड्राइविंग सीट पर बैठे अबू इस्माइल खान ने भागने की कोशिश की, लेकिन बाद में हुई मुठभेड़ में उसे गोली मार दी गई। पुलिस ने कार पर फायरिंग की। वहीं दूसरा बंदूकधारी अजमल कसाब था, जो घायल होने का नाटक करते हुए बिना हिले-डुले कार में पड़ा रहा।

बेमिसाल बहादुरी का पल..AK-47 के सामने एक डंडा

सिर्फ एक लाठी लेकर, ASI ओंबले कार के पास पहुंचे दूसरा आतंकी मर गया या नहीं ये देखने कसाब के बिलकुल पास पहुंच गए। जैसे ही उन्होंने कार का दरवाजा खोला, कसाब अचानक उठा और पास से गोली चला दी। बिना हथियार के होने के बावजूद, ओंबले आगे बढ़े, कसाब की राइफल की बैरल पकड़ी और छोड़ी नहीं, जिससे उनके सीने में कई गोलियां लगीं। उनका शरीर छलनी होता गया, लेकिन उन्होंने आतंकी कसाब को नहीं छोड़ा।

उनकी पकड़ ऐसी थी कि कसाब कुछ ना कर सका। ऐसे में दूसरे अफसरों की भी उन्होंने जान बचाई और पुलिस टीम ने आतंकी को जिंदा पकड़ लिया। कसाब का जिंदा पकड़ा जाना 26/11 की जांच में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया, जिससे हमले के पीछे की प्लानिंग, ट्रेनिंग और हैंडलर्स का पता चला।

एक कुर्बानी जिसने सच सामने ला दिया

ASI ओंबले ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। लेकिन उनके कामों से भारत को साजिश का अकेला ज़िंदा गवाह मिल गया। उनकी हिम्मत ने अनगिनत जानें बचाईं और जांच करने वालों को जरूरी जानकारी मिल पाई जिससे मुंबई हमले के नेटवर्क को दुनिया भर में उजागर किया गया।

अशोक चक्र से सम्मानित

वहीं, उनकी बहुत बड़ी बहादुरी के लिए भारत सरकार ने 26 जनवरी 2009 को तुकाराम ओंबले को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया, जो शांति के समय का देश का सबसे बड़ा बहादुरी का अवॉर्ड है। उनकी विधवा पत्नी को यह सम्मान रिपब्लिक डे सेरेमनी के दौरान प्रेसिडेंट प्रतिभा पाटिल ने दिया।

बता दें कि सत्रह साल बाद भी, ASI तुकाराम ओंबले का नाम बिना किसी स्वार्थ के सेवा और पक्के कर्तव्य की निशानी के तौर पर जाना जाता है। गिरगांव चौपाटी पर उनकी बहादुरी को भारत के पुलिस इतिहास में हिम्मत के सबसे अनोखे कामों में से एक के तौर पर याद किया जाता है। उनकी जबरदस्त बहादुरी की वजह से मुंबई पुलिस कसाब को ज़िंदा पकड़ पाई, जिससे भारत को 26/11 की जांच में सबसे बड़ी कामयाबी मिली।

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 Nitin Arora
Nitin Arora Author

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदे... और देखें

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