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नकली पनीर पर नकेल : MP में 'एनालॉग पनीर' बैन, FSSAI के नियमों की अनदेखी पड़ेगी भारी

एमपी में एनालॉग पनीर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाएगा। आगामी त्योहारों ध्यान में रखते हुए 'शुद्ध के लिए युद्ध' अभियान के तहत मिलावटी मावा और अन्य खाद्य पदार्थों की लगातार निगरानी की जा रही है।

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MP में 'एनालॉग पनीर' बैन (फोटो-Istock)

मध्य प्रदेश में नकली और सिंथेटिक पनीर (एनालॉग पनीर) के खिलाफ राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि राज्य में एनालॉग पनीर को हतोत्साहित किया जाएगा और इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाएगा। सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रदेश को प्राकृतिक रूप से उत्पादित शुद्ध दूध और दुग्ध उत्पादों की गुणवत्ता के लिए पहचान दिलाना है।

पड़ोसी राज्यों के प्रतिबंध का असर

राज्य के मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने बताया कि गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे पड़ोसी राज्यों द्वारा एनालॉग पनीर पर प्रतिबंध लगाने के बाद, मध्य प्रदेश में इसके डंपिंग (खपत या खपाए जाने) की आशंका काफी बढ़ गई थी। FSSAI के दिशा-निर्देशों के बावजूद कई जगह इनका सही पालन नहीं होता है, जिससे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों का इस्तेमाल कर नकली पनीर तैयार किया जाता है।

'शुद्ध के लिए युद्ध' अभियान

सरकार ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि जो लोग भी एनालॉग पनीर के निर्माण या बिक्री में शामिल हैं, वे इस कारोबार को तुरंत बंद कर दें। आदेश जारी होने के बाद नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तुरंत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी और ऐसे उत्पादों को जब्त कर नष्ट कर दिया जाएगा।

आगामी त्योहारों जैसे रक्षाबंधन को ध्यान में रखते हुए, राज्य के खाद्य विभाग द्वारा 'शुद्ध के लिए युद्ध' अभियान के तहत मिलावटी मावा और अन्य खाद्य पदार्थों की लगातार निगरानी की जा रही है, ताकि आम जनता को सुरक्षित और शुद्ध खाद्य सामग्री मिल सके।

Pushpendra kumar
पुष्पेंद्र कुमारauthor

पुष्पेंद्र कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में चीफ कॉपी एडिटर के रूप में सिटी डेस्क पर कार्यरत हैं। जर्नलिज्म में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद से वे पिछले 7 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता में जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने 10,000 से अधिक खबरें लिखी हैं। पुष्पेंद्र हाइपर-लोकल मुद्दों, रेलवे, रोड, इंफ्रास्ट्रक्चर, डेवलपमेंट, कृषि और मौसम से जुड़ी खबरों पर गहरी पकड़ रखते हैं। शहर से लेकर गांव-देहात तक की संवेदनशीलताओं को समझते हुए वे लोकल खबरों को ऐसा रूप देते हैं जो न केवल तथ्यपूर्ण होता है, बल्कि पाठकों से भावनात्मक रूप से भी जुड़ता है।

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