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क्या कभी सच में लंदन से कलकत्ता तक चलती थी बस? रूट और किराया भी जान लीजिए

लंदन से कोलकाता तक चलने वाली ऐतिहासिक बस सेवा दुनिया की सबसे लंबी सड़क यात्रा मानी जाती थी। यूरोप और एशिया के कई देशों से होकर गुजरती थी यह बस। इस यात्रा में 110 दिन तक का समय लगता था। यह सेवा ‘हिप्पी ट्रेल’ का अहम हिस्सा बन गई थी और यात्रियों के लिए आउट ऑफ द वर्ल्ड अनुभव थी।

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मौज-मस्ती में पूरी जाती थी 110 दिन की यात्रा

क्या आपने कभी भारत से लंदन तक सड़क मार्ग से यात्रा करने के बारे में सोचा है? मतलब बस, कार या मोटरसाइकिल से यात्रा? खैर आपने सोचा हो या न सोचा हो, हाल के वर्षों में कई लोगों ने अपनी 4X4 कार और कुछ लोगों ने बाइक से भी यह सफर किया है। लेकिन हम Youtube के दौर के इन यात्रियों की बात नहीं कर रहे हैं। यहां बात हो रही है कलकत्ता (आज कोलकाता) और लंदन के बीच चलने वाली बस सेवा की। जी हां, एक समय ऐसी बस सेवा उपलब्ध थी, जो बाद में बंद हो गई। आज भले ही ऐसी कोई बस सेवा मौजूद नहीं हो, लेकिन देश की आजादी के बाद एक दौर ऐसा भी था, जब आप कलकत्ता से बस में सवार होकर लंदन तक जा सकते थे। चलिए जानते हैं इस अद्भुत बस यात्रा के बारे में।

कोलकाता और लंदन के बीच की यह बस सेवा आज के मुकाबले काफी धीमी रफ्तार वाली थी। यह यात्रा उस समय के लिहाज से भी रफ्तार में धीमी थी। लंदन-कलकत्ता-लंदन कोच रूट 21 साल तक चला। यह बस सेवा उस समय एक अनोखी यात्रा थी। इस यात्रा में नोस्टाल्जिया भी था और यह यात्रा एक तरह से अपने आप में किवदंति भी थी। यह उस समय की बात है जब लंबे-चौड़े हाईवे और एक्सप्रेसवे मौजूद नहीं थे। तब विभिन्न देशों के बॉर्डरों पर आज जैसी सख्ती नहीं थी और यात्रा करना खोज करने जैसा था, न कि कठिन सवालों के जवाब देने जैसा।

110 दिन लंबी बस यात्रा

लंदन-कलकत्ता-लंदन के इस रूट पर उस समय चलने वाली बस का नाम अलबर्ट (Albert) था। उस समय यह दुनिया का सबसे लंबा बस रूट था और इस रूट पर बस को यात्रा पूरी करने में 110 दिन का समय लगता था। इन 110 दिनों की यात्रा में बस कई देशों से होकर गुजरती थी। कई टाइमजोन को पार करती थी। सफर के दौरान बस कभी पहाड़ी इलाकों तो कभी मैदानी और कभी रेगिस्तानी हिस्सों से गुजरती थी। यह एशियाई और यूरोपीय देशों के बीच एक तरह से रोड डिप्लोमेसी थी, जिसे आज रिपीट कर पाना लगभग नामुमकिन है।

किस दौर में चलती थी ये बस सेवा

कलकत्ता से लंदन की इस यात्रा में समय लगता था, क्योंकि तब लोगों के पास समय होता था। क्योंकि यह उस दौर की बात है जब जिंदगी एक अलग ही रफ्तार से चलती थी। यह दौर था 1950-60 का। चार महीने लंबी यह यात्रा, आपके काम से ब्रेक लेने जैसा नहीं थी, बल्कि जिंदगी का एक हिस्सा हुआ करती थी। आज के दौर में भले ही 20 हजार किलोमीटर की दूरी बस से करना अटपटा लगे, लेकिन तब इसे आरामदायक और दुनिया देखने का लग्जुरियस तरीका माना जाता था।

सच में कहा जाए तो हमें आज इस यात्रा की जरूरत ज्यादा है। लग्जरी के लिए नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसे एक अलग रूप में देखने के लिए। इस बस ने अपनी यात्रा साल 1957 लंदन में विक्टोरिया कोच स्टेशन से शुरू की थी। अक्सर एक ब्लैक-एंड-व्हाइट फोटो आज के दौर में सोशल मीडिया पर दिख जाती है, जिसमें बस के यात्री डबल डेकर बस में चढ़ने के लिए कतार में खड़े हैं। शायद उन लोगों को भी तब अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनकी यह तस्वीर उनसे ज्यादा लंबी यात्रा करेगी।

इस बस में एक किचन भी था

इस बस में एक किचन भी था

दुनिया को जोड़ने वाली बस यात्रा

उस बस सेवा का नाम भले ही लंदन-कलकत्ता-लंदन हो। लेकिन यह बस सेवा दुनिया को आपस में जोड़ती थी। इस बस की आधिकारिक टिकट भी अब तो इतिहास का हिस्सा बन गई है। लंदन से शुरू होने के बाद यह बस कई देशों की यात्रा करते हुए भारत पहुंचती थी। इस बस को पाकिस्तान से भारत में एंट्री करने के बाद कलकत्ता पहुंचने में ही 5 दिन का समय लग जाता था।

इन देशों से गुजरती थी ये बस

  • ब्रिटेन
  • बेल्जियम
  • पश्चिमी जर्मनी
  • ऑस्ट्रिया
  • युगोस्लाविया
  • बुल्गारिया
  • तुर्किये
  • इरान
  • अफगानिस्तान
  • पाकिस्तान
  • भारत

इस बस में एक तरफ का टिकट 85 पाउंड का था और वापसी का टिकट मात्र 65 पाउंड में मिल जाता था। अगर टिकट के उस दाम को आज इंफ्लेशन के साथ एडजस्ट किया जाए तो आज के दौर में एक तरफ की यात्रा में 7900 रुपये में होती और वापसी की टिकट के लिए सिर्फ 6 हजार रुपये खर्च करने पड़ते। यानी दोनों तरफ की यात्रा के लिए 145 पाउंड की टिकट लगता, जो आज के दौर में इंफ्लेशन को एडजस्ट करके 13,500 रुपये होता। बड़ी बात ये है कि इसी टिकट में यात्रा का किराया, खाने और रुकने का खर्च भी शामिल था।

लग्जरी के दौर से पहले की लग्जरी बस

अलर्बट कोई आम या मामूली बस सेवा नहीं थी। इस डबल डेकर बस के निचले हिस्से में रीडिंग और डाइनिंग लाउंज था, जबकि ऊपरी हिस्से में आगे की तरफ पैनोरमिक व्यू के लिए शीशा लगा हुआ था। बस में एक किचन भी थी, जिसमें यात्रियों के लिए ताजा-ताजा खाना बनाया जाता था। बस में रेडियो के जरिए संगीत बजाया जाता था और यात्रा के दौरान पार्टियों का दौर चलता था। तब न वाईफाई था, न टीवी-मोबाइल की स्क्रीन, उस समय यही यात्रा के दौरान मनोरंजन के अच्छे साधन थे।

यह बस जगह-जगह रुककर अपने यात्रियों को साइटसीइंग कराती थी। बस भारत में ताजमहल, राजपथ, बनारस के घाट के साथ ही अफगानिस्तान में कबायलियों की पारंपरिक ड्रेस, तुर्किए में गोल्डन हॉर्न, बुल्गारिया में कम्युनिस्ट शासन में जिदगी कैसी होती है, यह सब दिखाते हुए आगे बढ़ती थी। यह बस कैस्पियन सागर, ब्लू डैन्यूब और राइन वैली के करीब भी जाती थी।

2 दशक बाद बंद हो गई ये सेवा

लंदन और कलकत्ता के बीच यह बस 20 साल से ज्यादा समय तक चलती रही और हजारों यात्रियों ने इसमें यात्रा की। उन यात्रियों और यात्राओं की यादें अब तस्वीरों, टिकटों और अखबारों की कतरनों में बिखरी हुई हैं। उस समय यह धीमी यात्रा अद्भुत थी। आज की जियोपॉलिटिक्स, वीजा के सख्त नियम, सुरक्षा चिंताएं और देशों की सीमाओं पर प्रतिबंध इस तरह से रूट को असंभव बना देते हैं। आज भले ही अलर्बट को बंद हुए 50 साल से ज्यादा का समय गुजर चुका है, लेकिन कभी यह दुनिया की सबसे लंबी बस यात्रा थी, जो आज बस यादों में है।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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