Times Now Navbharat
live-tv
Premium

First Indochina War: 7 साल से ज्यादा चले इस युद्ध में ना India था, ना China, फिर कैसे पड़ा ये नाम

फर्स्ट इंडोचाइना वार 1946 से 1954 के बीच हुई। इस युद्ध में न तो भारत की कोई भूमिका थी और न ही चीन इसमें शामिल था। प्रश्न ये है कि फिर इस युद्ध का नाम फर्स्ट इंडोचाइना वार क्यों पड़ा। आखिर किन देशों के बीच लड़ा गया यह युद्ध। किसकी जीत हुई और इससे क्या हासिल हुआ?

Image
सात साल से ज्यादा चले इस युद्ध में 8 लाख से ज्यादा लोग मारे गए
Authored by: Digpal Singh
Updated Mar 25, 2026, 09:54 IST
Follow on Google News

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ है। दोनों तरफ से ताबड़तोड़ हमले जारी हैं। इस युद्ध के बीच आज हम जानते हैं फर्स्ट इंडोचाइना वार के बारे हैं। आज आप किसी भी भारतीय से पूछेंगे कि भारत और चीन के बीच पहला युद्ध कब हुआ था तो तुरंत जवाब आएगा 1962 में। इस युद्ध के बारे में इतनी कहानियां सुनी और सुनाई गई हैं कि कोई बच्चा भी जानता है कि भारत और चीन के बीच 1962 में भीषण युद्ध हुआ था, जिसमें भारत को दुर्भाग्यपूर्ण हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद दोनों देशों में कभी इस स्तर का युद्ध नहीं हुआ, भले ही आमने-सामने कई बार आए हों। हालांकि, ये भी सच है कि 1967 में दोनों सेनाएं एक बार फिर आमने सामने आई थीं और इस बार भारत को जीत मिली थी। लेकिन बात First Indochina War की हो रही है। इस युद्ध की अजीब बात ये है कि इसमें न तो भारत शामिल था और न ही चीन। फिर भी इसे फर्स्ट इंडोचाइना वार क्यों कहते हैं? और यह युद्ध किन देशों के बीच हुआ था? चलिए जानते हैं -

कब हुई पहली इंडोचाइना वार?

फर्स्ट इंडोचाइना वार दिसंबर 1946 से अगस्त 1954 के बीच हुई थी। यहां गौर करने वाली बात ये है कि इस लड़ाई में भारत और चीन दोनों ही शामिल नहीं थे। जब यह युद्ध शुरू हुआ, उस समय तो भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद भी नहीं हुआ था।

किन देशों के बीच हुई फर्स्ट इंडोचाइना वार?

फर्स्ट इंडोचाइना वार में जब भारत और चीन दोनों शामिल नहीं थे तो आखिर ये हुई किन दो देशों के बीच और इसका नाम इंडोचाइना वार क्यों पड़ा? अगर आपके मन में भी यही प्रश्न है तो बता दें कि यह लड़ाई वियत मिन्ह और फ्रेंच कोलोनियल फोर्सेस के बीच हुआ था। इस युद्ध का एकमात्र उद्देश्य वियतनाम पर कब्जा करना था। पश्चिमी देशों में इसे फर्स्ट इंडोचाइना वार नाम से जाना जाता है।

फ्रांसीसियों के लिए इंडोचाइना क्या था

फ्रांसीसी लोग उस समय अपने नियंत्रण में आने वाले एशिया के एक खास हिस्से को इंडोचाइन कहते थे, जिसमें आज के वियतनाम, लाओस, कंबोडिया आते हैं। इंडोचाइना का सीधा संबंध भारत और चीन से नहीं है, बल्कि यह नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि इन क्षेत्रों में भारतीय और चीनी संस्कृति का व्यापक प्रभाव था। भारत और चीन दोनों ही इसमें शामिल नहीं थे। हालांकि, बाद के दौर में जब अमेरिकी सैनिक वियतनाम युद्ध में उतरे तो चीन ने उत्तरी क्षेत्र में नियंत्रण रखने वाले वियत मिन्ह का समर्थन किया।

French indochina

French indochina

वियतनाम में किस नाम से जाना जाता है ये युद्ध

पश्चिमी दुनिया जहां इस युद्ध को फर्स्ट इंडोचाइना वार कहती है, वहीं वियतनाम में इसे एंटी फ्रेंच वार कहा जाता है। यह लड़ाई एक बड़े भू-भाग में दो छोटी और कम सैन्य साजो-सामान वाली सेनाओं के बीच हुई थी। यह एक ऐसी जंग थी, जिसमें स्ट्रैटजी और टैक्टिक्स का काफी अहम रोल रहा। आखिरकार वियतनामी टैक्टिक और स्थानीय ज्ञान के आगे फ्रांसीसी हार गए।

आखिर First Indochina War हुआ ही क्यों?

दरअसल 1945 में अमेरिका ने जापान के दो शहरों पर परमाणु बम गिरा दिए। इसी के साथ जापान की युद्ध में हार हुई और उसने आत्मसमर्पण कर दिया। जापान के आत्मसमर्पण के साथ ही वियतनाम में सत्ता का खालीपन भी पैदा हो गया। इस अवसर का लाभ उठाकर हो ची मिन्ह ने 2 सितंबर 1945 को अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी, लेकिन पश्चिमी देशों ने इसे मान्यता नहीं दी।

चीन और ब्रिटेन ने दिया फ्रांस का साथ

जापान दूसरे विश्व युद्ध में हार चुका था, उसके लोग वियतनाम छोड़कर वापस जा रहे थे। इस दौरान ब्रिटिश और चीनी सेनाओं ने मिन्ह का समर्थन करने की बजाय फ्रांस को फिर से यहां की सत्ता में काबिज होने में मदद की। फिर 1946 तक फ्रांस ने सैगॉन सहित कई क्षेत्रों को अपने कब्जे में ले भी लिया। फ्रांसीसी सेना ने उत्तरी वियतनाम के हाईफोंग पर बमबारी की, जिसके बाद वियत मिन्ह ने भी जवाबी हमला किया और दिसंबर 1946 तक दोनों पक्षों के बीच खुला युद्ध शुरू हो गया।

वियत मिन्ह की कमजोरियां भी कम नहीं थीं

वियम मिन्ह जरूर पश्चिमी ताकतों से लोहा ले रहे थे। लेकिन उनके पास भारी संख्या में सैनिक होने के बावजूद हथियार और ट्रेनिंग की बड़ी कमी थी। उनके ज्यादातर हथियार जापानी या फ्रांसीसी स्रोतों से कब्जे में लिए गए थे। 1946 के अंत तक वियत मिन्ह के पास 60 हजार सैनिक थे, लेकिन उनके पास हथियारों के नाम पर सिर्फ 40 हजार ही राइफल मौजूद थीं। इसके अलावा मिलिट्री ट्रेनिंग नहीं होने की वजह से उनके सैनिकों में अनुशासन और स्ट्रैटजी की भारी कमी थी।

वियत मिन्ह के काम आई गुरिल्ला युद्ध रणनीति

मिन्ह के सैनिकों ने फ्रांसीसी सैनिकों से सीधे युद्ध करने की बजाय जंगलों-पहाड़ों में छिपकर गुरिल्ला युद्ध करने की रणनीति अपनाई। अचानक और घात लगाकर हमले उनकी मुख्य रणनीति बने। वह जंगल के इतने भीतर अपने बेस बनाते थे, जहां तक पहुंच पाना फ्रांसीसी सेना के लिए लगभग नामुमकिन होता था।

Firstindochinawar

Firstindochinawar

मिन्ह को मिला जनता का समर्थन

फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के खिलाफ वियत मिन्ह को वहां की ग्रामीण जनता का समर्थन मिला। स्थानीय लोग उन्हें भोजन, जानकारी और छिपने की जगह देते थे, जिससे उनकी ताकत बढ़ी। वह फ्रांसीसी सैनिकों से सीधे भिड़ना नहीं चाहते थे, बल्कि उनकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को निशाना बनाते और उनके संसाधनों को बर्बाद कर देते थे। वह चाहते थे कि फ्रांस के लोगों को लगे कि यह युद्ध उन्हें काफी महंगा पड़ रहा है।

उस समय फ्रांस की सेना में फ्रांसीसी नागरिकों के साथ ही वियतनाम में उनके समर्थक भी मौजूद थे। इसके अलावा अफ्रीकी में उनके गुलाम देशों के सैनिक भी शामिल थे। हालांकि, फ्रांसीसी सैनिकों के पास उस समय के लिहाज से अच्छे हथियार भी थे, लेकिन संसाथनों की कमी और आर्थिक संकट से उन्हें जूझना पड़ा। साल 1949 में फ्रांस ने बाओ दाई के नेतृत्व में एक नई सरकार भी बनाई, ताकि वियत मिन्ह के प्रभाव को कम किया जा सके। लेकिन यह युद्ध हर बीते दिन के साथ फ्रांस को हार की ओर ले जा रहा था। 1952 तक युद्द और तेज हो गया। फिर 1953 में अमेरिका की तरफ से भी फ्रांसीसी सेना (CEFEO) को मिलिट्री एड मिलने लगी।

आंकड़ों में फर्स्ट इंडोचाइना वार

  • वियत मिन्ह के 1,91,605 लोग मारे गए या गायब हो गए
  • फ्रांस के 74,220 लोगों की मौत हुई या गायब हो गए, जिसमें 20,685 फ्रांसीसी सैनिक थे
  • फ्रांस की तरफ से 64,127 घायल हुए, दक्षिण वियतनाम के लोग 58,877 मारे गए
  • युद्ध में कुल 4 से 8.4 लाख से ज्यादा लोगों के मारे जाने का अनुमान
  • युद्ध में 1,25,000–4,00,000 आम नागरिकों की मौत का अनुमान

अब वियत मिन्ह ने फ्रांस के उपनिवेश लाओस तक अपनी गतिविधियां बढ़ा दीं, जिससे फ्रांसीसी संसाधनों पर दबाव बढ़ता चला गया। और फिर डिएन बिएन फू की निर्णायक लड़ाई का रास्ता तैयार हुआ। आखिरकार 11 अगस्त 1954 को सीजफायर के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ।

End of Article