कोलकाता

ममता बनर्जी को अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ा , ये था उसका कारण

उत्तर बंगाल का तीन-दिवसीय प्रशासनिक दौरा कर रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी संबंधी समस्याओं के कारण अपने ठहरने का बंदोबस्त ‘कन्याश्री’ बंगले के बजाय ‘उत्तरकन्या’ में स्थानांतरित करना पड़ा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी।

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी (PHOTO- Mamata Banerjee (@MamataOfficial)

कोलकाता: उत्तर बंगाल का तीन-दिवसीय प्रशासनिक दौरा कर रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी संबंधी समस्याओं के कारण अपने ठहरने का बंदोबस्त ‘कन्याश्री’ बंगले के बजाय ‘उत्तरकन्या’ में स्थानांतरित करना पड़ा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी।

न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा को अधिकारी ने बताया किकि कन्याश्री बंगले में मोबाइल नेटवर्क की समस्या थी, जिसके चलते मुख्यमंत्री बनर्जी को नेपाल के घटनाक्रम से जुड़ी अद्यतन जानकारी मिल पाना मुश्किल हो गया था। नतीजतन, मुख्यमंत्री मंगलवार रात स्थिति पर करीब से नजर रखने के लिए ‘उत्तरकन्या’ चली गईं।

बाद में, तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी प्रमुख की एक तस्वीर साझा की, जिसमें बनर्जी को ‘उत्तरकन्या’ में बैठकर दंगा प्रभावित पड़ोसी देश के हालात पर नजर रखते देखा जा सकता है। ‘उत्तरकन्या’ सिलीगुड़ी स्थित एक इमारत है, जहां पश्चिम बंगाल के उत्तर बंगाल विकास विभाग का अस्थायी राज्य कार्यालय स्थित है। तृणमूल कांग्रेस ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘हमारे पड़ोसी देश नेपाल में उभरती स्थिति गहरी चिंता का विषय है। राज्य के हितों को सर्वोपरि रखते हुए, हमारी मुख्यमंत्री रात भर ‘उत्तरकन्या’ राज्य सचिवालय में रहीं और व्यक्तिगत रूप से (पड़ोसी देश के) हर घटनाक्रम पर पूरी सतर्कता से नजर रखी।’

(भाषा इनपुट )

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

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