East Indian Railway History: 15 अगस्त 1854 की सुबह देखने में बिल्कुल साधारण थी, लेकिन यही दिन आगे चलकर इतिहास का हिस्सा बन गया। न कोई उत्सव था और न ही लोगों की भारी मौजूदगी। हावड़ा स्टेशन से सुबह ठीक 8:30 बजे एक अंग्रेज्री इंजन पांच डिब्बों के साथ बिना किसी शोर-शराबे के हुगली की दिशा में रवाना हुआ। इसी शांत शुरुआत ने पूर्वी भारत में रेल यात्रा के नए दौर की नींव रखी। यह सिर्फ एक ट्रेन की यात्रा नहीं थी, बल्कि उस इंजीनियरिंग सोच की शुरुआत थी जिसने भविष्य की गति और दिशा दोनों को बदल दिया।
हालांकि ईस्ट इंडियन रेलवे (ईआईआर) की यह उपलब्धि ऐतिहासिक थी और उसका विस्तृत रेल तंत्र आगे चलकर 1860 के दशक तक दिल्ली तक पहुंच गया, लेकिन इस सफलता के पीछे कई दुखद घटनाएं भी जुड़ी रहीं। इन हादसों ने न सिर्फ रेलवे के फैलाव की गति को प्रभावित किया, बल्कि आम लोगों के जीवन और सोच में इसके सहज स्वीकार को भी देर से जगह मिली। ईस्ट इंडियन रेलवे और उसे आकार देने वाली ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी की स्थापना से लेकर उसके विकास की पूरी यात्रा पर केंद्रित एक नई पुस्तक, 19वीं सदी के विविध दस्तावेजों और अलग-अलग अभिलेखागारों से जुटाई गई सामग्री के आधार पर, इस रेल व्यवस्था और उसे ईंट-दर-ईंट, लोहे-लोहे जोड़कर खड़ा करने वाले लोगों की एक जीवंत और मार्मिक कहानी सामने लाने का प्रयास करती है।

पूर्वी भारत में पहली ट्रेन
रेल्स थ्रू राज: द ईस्ट इंडियन रेलवे
रेल्स थ्रू राज: द ईस्ट इंडियन रेलवे (1841–1861) के लेखक पी. के. मिश्रा के अनुसार, उद्घाटन यात्रा से पहले ही ईस्ट इंडियन रेलवे ने बंगाल के लोगों में गहरी उत्सुकता पैदा कर दी थी। उन्होंने लिखा है कि 29 जून 1854 को हावड़ा से पांडुया के बीच केवल इंजन चलाकर परीक्षण किया गया। इसके बाद 6 जुलाई को उसी मार्ग पर इंजन के साथ एक डिब्बा जोड़कर प्रयोगात्मक यात्रा कराई गई। भारतीय रेल के वरिष्ठ अधिकारी और रेलवे विरासत के संरक्षण के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे पी. के. मिश्रा ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में यह भी बताया कि भारत में 1853 में पहली रेल के चलने से पहले ही ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी की स्थापना हो चुकी थी।
ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी का गठन कब हुआ?
1 जून 1845 को लंदन में ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी का गठन एक संयुक्त स्टॉक कंपनी के रूप में किया गया था, जबकि इसका मुख्य कार्यालय कलकत्ता (आज का कोलकाता) में स्थापित किया गया। लेखक के अनुसार, कंपनी के अस्तित्व में आने से पहले उसे “औपनिवेशिक नौकरशाही की भारी-भरकम बाधाओं” का सामना करना पड़ा। भूमि अधिग्रहण में हुई देरी और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं के कारण ईस्ट इंडियन रेलवे का काम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सका। इस बीच ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (जीआईपीआर) ने इस अवसर का लाभ उठाया और आगे निकलते हुए भारत की पहली रेलवे होने का सम्मान प्राप्त किया। देश में पहली यात्री रेल सेवा 16 अप्रैल 1853 को शुरू हुई, जब एक ट्रेन बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) से ठाणे के लिए रवाना हुई।
कलकत्ता और हुगली के बीच रेलवे लाइन
‘ईआईआर: द इनॉगरल जर्नी (1854)’ नामक अध्याय में पी. के. मिश्रा बताते हैं कि 1854 की शुरुआत तक कलकत्ता और हुगली के बीच रेलवे लाइन बिछ चुकी थी, लेकिन पूरी तरह तैयार होने के बावजूद उसका संचालन शुरू नहीं हो पाया था। उनके अनुसार, इंजनों की पहली खेप इंग्लैंड से ऑस्ट्रेलिया होते हुए ‘केजरी’ नामक जहाज से कलकत्ता लाई गई। उस समय हावड़ा में जरूरी ढांचागत सुविधाओं का अभाव था, इसलिए “इन भारी-भरकम लोहे के इंजनों” को उतारना तत्कालीन सूझबूझ और इंजीनियरिंग दक्षता की एक बड़ी परीक्षा थी, जिसे सफलतापूर्वक पार किया गया।
15 अगस्त 1854 को क्या हुआ?
इन्हीं घटनाओं के बीच ईस्ट इंडियन रेलवे की कहानी ने एक दुखद मोड़ भी लिया, जब बंगाल की खाड़ी में आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने परिस्थितियों को और कठिन बना दिया। यही ईआईआर आगे चलकर आजादी के बाद, साल 1952 में, भारतीय सरकार के अधीन पूर्व रेलवे के रूप में पुनर्गठित हुई। आखिरकार वह ऐतिहासिक क्षण आया जब 15 अगस्त 1854 की सुबह हावड़ा में बने एक साधारण, अस्थायी शेड से आज के भव्य स्टेशन भवन से बिल्कुल अलग ट्रेन रवाना हुई।

हुगली पहुंचकर रचा इतिहास
91 मिनट में हुगली पहुंचकर रचा इतिहास
इसने लगभग 38 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए मात्र 91 मिनट में हुगली पहुंचकर इतिहास रच दिया। मिश्रा के अनुसार, इस पहली यात्रा के लिए लगभग 3,000 आवेदन प्राप्त हुए थे, जबकि ट्रेन की क्षमता उससे दस गुना कम थी। इसके बाद 3 फरवरी 1855 को हावड़ा–रानीगंज खंड का उद्घाटन पूरे वैभव के साथ किया गया। इस अवसर पर तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी खुद हावड़ा स्टेशन पर मौजूद थे और इसी के साथ पूर्वी भारत में रेल इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय औपचारिक रूप से शुरू हुआ।
(इनपुट - भाषा)
