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खूब उड़ाया होगा अबीर-गुलाल, आज जान लीजिए किन शहरों में बनते हैं आपकी होली के रंग?

होली के दौरान हवा में उड़ते गुलाल को देखकर खुशी तो मिलती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी होली में रंग भरने वाले असली 'जादूगर' कहां रहते हैं? आइए जानते हैं उन शहरों के बारे में जहां साल भर इस एक दिन के लिए मेहनत की जाती है। जानेंगे उस खास शहर के बारे में जहां देश का आधा गुलाल बनता है। साथ ही जानेंगे 400 साल पुरानी 'गुलाल गोटा' कला के बारे में।

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वो शहर जहां गुलाल बनते हैं

Photo : Times Now Digital

Cities Known For Colours: भारत में होली का त्योहार रंगों के बिना अधूरा है, या यूं कहना बेहतर होगा कि होली रंगों का ही त्योहार है। होली के दिन रंगों से सराबोर माहौल में जब अबीर-गुलाल उड़ते हैं तो क्या कभी आपके दिमाग में आया है कि देशभर की गलियों और चेहरों को रंगने वाला यह गुलाल आता कहां से है? भारत में कुछ ऐसे शहर हैं जहां साल भर सिर्फ होली की तैयारी चलती रहती है। होली में जितनी रंगों की खपत होती है, उसका आधा से अधिक हिस्सा एक ही शहर में बनता है।

हाथरस: भारत की 'कलर कैपिटल'

उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में स्थित हाथरस जिला वैसे तो हींग के लिए काफी प्रसिद्ध है लेकिन इसे 'गुलाल नगरी' के नाम से जाना जाता है। इसे भारत की 'रंग राजधानी' (Color Capital of India) भी कहें तो गलत नहीं होगा। यहां की फैक्ट्रियों में इतनी बड़ी मात्रा में गुलाल बनाया जाता है कि यहां से न केवल पूरे भारत को रंगों की सप्लाई होती है, बल्कि विदेशों में भी हाथरस का गुलाल भेजा जाता है। हाथरस के बिना भारत की होली की कल्पना करना भी मुश्किल है।

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हाथरस में बनते हैं सबसे ज्यादा रंग (सांकेतिक चित्र)

जयपुर का गुलाल गोटा: 400 साल पुरानी परंपरा

होली के रंगों में केवल हाथरस का नाम नहीं है। राजस्थान की राजधानी जयपुर भी अपनी अनूठी परंपरा 'गुलाल गोटा' के लिए मशहूर है। यह करीब 400 साल पुरानी कला है, जिसे आज भी मनिहार समुदाय (लाख के कारीगर) जीवित रखे हुए हैं। बता दें कि गुलाल गोटा लाख की एक बेहद पतली और छोटी गेंद होती है, जिसमें सूखा गुलाल भरा जाता है। इसका वजन सिर्फ 20 ग्राम के आसपास होता है। इसे बनाने के लिए कारीगर लाख को पानी में उबालकर लचीला बनाते हैं, फिर 'फुंकनी' की मदद से इसे गेंद का आकार देते हैं। जयपुर के राजा सवाई जय सिंह द्वितीय के समय से ही इसका चलन है। पुराने समय में राजा हाथी पर सवार होकर जनता पर गुलाल गोटा फेंकते थे। आज भी जयपुर के 'मनिहारों का रास्ता' (त्रिपोलिया बाजार) में ये पारंपरिक रंग मिलते हैं।

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जयपुर में बनता है खास गुलाल गोटा (चित्र साभार: iStock)

प्राकृतिक रंगों के लिए प्रसिद्ध उदयपुर

हर्बल और इको-फ्रेंडली होली के शौकीनों के माल की बड़ी खेप उदयपुर से आती है। यहां गुलाब की पंखुड़ियों, हल्दी और दूसरी प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल करके गुलाल तैयार किया जाता है। यहां के स्वयं सहायता समूह (SHGs) यह गुलाल तैयार करते हैं, जिसकी मांग समय के साथ अब देशभर में बढ़ रही है।

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दिल्ली-NCR और मुंबई में भी बनते हैं गुलाल

दिल्ली-एनसीआर और बाकी शहर

इन शहरों के अलावा राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के इलाके जैसे गाजियाबाद और बहादुरगढ़, कमर्शियल और हर्बल रंगों के बड़े केंद्र बन चुके हैं। इसके अलावा कानपुर, मथुरा, रायपुर, इंदौर, सोलापुर और मुंबई में भी गुलाल बनाने की कई छोटी-बड़ी इकाइयां काम कर रही हैं। आपके हमारे पसंदीदा रंगों को बनाते हैं और होली को रंगीन बनाए रखते हैं।

Nishant Tiwari
निशांत तिवारीauthor

निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृष्टि उन्हें इस बीट का एक भरोसेमंद और प्रभावी कंटेंट राइटर बनाती है। वे जटिल लोकल इश्यूज को सहज, स्पष्ट और असरदार अंदाज में पेश करने में दक्ष हैं और अबतक 2,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट लिख चुके हैं। उनकी लेखन शैली शहर की नब्ज पकड़ते हुए ऐसे कंटेंट पर केंद्रित रहती है, जो सीधे पाठकों के जीवन और उनकी रोजमर्रा की चिंताओं से जुड़ा होता है।

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