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'जनता का भरोसा सबसे जरूरी...', कथित शराब घोटाले पर फैसले देते हुए अदालत ने क्या-क्या कहा?

दिल्ली के कथित शराब घोटाला मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया को आरोपमुक्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि साजिश के आरोप न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। जज जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में जांच एजेंसियों की शक्ति और व्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को संविधान की मूल आवश्यकता बताया।

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कथित शराब घोटाले में कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को आरोप मुक्त किया।

Photo : ANI

दिल्ली के कथित शराब घोटाला मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एवं पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया को आरोपमुक्त कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन दोनों नेताओं पर साजिश रचने के जो आरोप लगे थे, वे सही साबित नहीं हुए और आरोप 'न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतरे।'

राउज एवेन्यू कोर्ट के जज जितेंद्र सिंह ने अपने आदेश में कहा है कि जांच एजेंसी की ताकत और किसी व्यक्ति के जीवन और निजी आजादी के अधिकार के बीच संतुलन बनाना संविधान की सीधी मांग है। यह किसी कानून की मेहरबानी नहीं है। अदालत ने साफ कहा कि अगर यह संतुलन बिगड़ता है तो कानून का राज कमजोर होता है और आपराधिक न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा भी डगमगा सकता है।

कहीं भी अन्याय हर जगह न्याय के लिए खतरा

कोर्ट ने अपने आदेश में अमेरिका के नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग(जूनियर) के शब्दों का जिक्र किया और कहा कि कहीं भी अन्याय होगा तो वह हर जगह न्याय के लिए खतरा बनेगा। अदालत ने यह भी कहा कि न्याय किया जाए चाहे उसके लिए कितनी भी मुश्किल क्यों न उठानी पड़े। न्यायालय का काम किसी एक कहानी को सही ठहराना या आसान रास्ता चुनना नहीं है। उसका काम सिर्फ कानून का पालन कराना है।

जनता का भरोसा सबसे जरूरी: कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि जब तक अदालतें इन मूल बातों पर टिकी रहेंगी तभी लोगों का भरोसा न्याय व्यवस्था पर बना रहेगा। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने मामले की फाइल को रिकॉर्ड रूम में भेजने का निर्देश दिया।

मुकदमा दाखिल करने के लिए कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि कई मामलों में यह देखा गया है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) केवल डिफॉल्ट जमानत के कानूनी असर से बचने के लिए मुकदमा दाखिल कर देता है, जबकि मूल अपराध की जांच अभी पूरी नहीं हुई होती है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में पीएमएलए के तहत कार्यवाही तो शुरू हो जाती है, लेकिन मूल अपराध की जांच अधूरी रहती है और कई मामलों में तो आरोप पत्र तक दाखिल नहीं हुआ होता। अदालत ने कहा कि उसके सामने ही एक ऐसा मामला है जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी कार्यवाही आरोप तय करने की अंतिम बहस तक पहुंच चुकी है, जबकि मूल अपराध में अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि कोई अपराध हुआ भी है या नहीं।

Piyush Kumar
पीयूष कुमारauthor

पीयूष कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क पर Senior Copy Editor के रूप में कार्यरत हैं। देश-दुनिया की हलचल पर उनकी पैनी नजर रहती है और इन घटनाओं को सटीक, सरल और असरदार अंदाज में खबरों की भाषा देना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। ब्रेकिंग न्यूज की रफ्तार हो या किसी जटिल मुद्दे को आसान बनाकर समझाने वाले एक्सप्लेनर—पीयूष दोनों में बराबर दक्षता रखते हैं। न्यूज जजमेंट, फैक्ट-बेस्ड राइटिंग और एंड-टू-एंड कॉपी प्रोडक्शन पर इनकी पकड़ मजबूत है और अबतक 4,000 से अधिक स्टोरी लिख चुके हैं।

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