दिल्ली हाईकोर्ट में मंगलवार को एक बेहद संवेदनशील और भावुकता से भरा मामला सामने आया, जहां एक महिला ने अपने पति (सैनिक), जो मार्च 2025 से कोमा में जीवन रक्षक उपकरणों पर हैं, के स्पर्म (शुक्राणु) को निकालकर सुरक्षित रखने की अनुमति मांगी। महिला ने इच्छा जताई कि वह भविष्य में अपने पति के स्पर्म के जरिए मां बनना चाहती है, इससे पहले कि पति की स्थिति और बिगड़ जाए। याचिकाकर्ता महिला ने बताया कि उनके पति मार्च 2025 से आईसीयू में भर्ती हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने हाल ही में एक अक्षम भारतीय सेना के सैनिक की पत्नी को इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) उपचार के माध्यम से बच्चे को गर्भ धारण करने के लिए उसके शुक्राणु निकालने की अनुमति दी। 13 अप्रैल को दिए गए फैसले में न्यायमूर्ति पुरुषैन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि इस तरह के उपचार के लिए सैनिक की पूर्व सहमति तब भी लागू होगी जब वह अक्षम हो।
कोर्ट सैनिक की पत्नी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें संतान प्राप्ति के उद्देश्य से पति के शुक्राणु निकालने और उन्हें क्रायो-प्रिजर्व करने की मांग की गई थी। न्यायालय ने पाया कि पति के अस्वस्थ होने से पहले, 2023 में दंपति ने आईवीएफ उपचार कराने का निर्णय लिया था। इस पर कोर्ट ने बेहद सराहनीय फैसला सुताने हुए कहा कि पति ने पहले आईवीएफ उपचार के लिए सहमति दी थी, लिहाजा उसके आधार पर भले ही वह वर्तमान में कोमा में हों, यह सहमति पर्याप्त होगी।
न्यायाधीश ने फैसला सुनाया कि यह निर्देश दिया जाता है कि याचिकाकर्ता के पति के आईवीएफ उपचार में शामिल होने की सहमति को एआरटी अधिनियम की धारा 22 के प्रयोजनों के लिए पर्याप्त अनुपालन माना जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार केवल पति की स्पष्ट सहमति के अभाव के आधार पर पत्नी की याचिका का विरोध नहीं कर सकती।
पति पहले ही दे चुके थे IVF के लिए सहमति
निर्णय में कहा गया कि यह भी निर्देश दिया जाता है कि यदि किसी अन्य चरण-प्रक्रिया के लिए आईवीएफ प्रक्रिया के लिए याचिकाकर्ता की सहमति आवश्यक हो, तो उसे उसके पति की वैध सहमति माना जाए। प्रतिवादी केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता को अयोग्य नहीं ठहरा सकते कि याचिकाकर्ता के पति की लिखित सहमति अनुपस्थित है। इस दंपत्ति ने 2023 में गर्भधारण के लिए आईवीएफ उपचार का विकल्प चुना था। हालांकि, 2025 में जम्मू-कश्मीर में अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान पति को मस्तिष्क में चोट लग गई और वे बिस्तर पर पड़ गए। इससे पहले, सेना ने सैनिक के आईवीएफ उपचार को जारी रखने की अनुमति दी थी। हालांकि, बाद में इस प्रक्रिया को रोक दिया गया।
पत्नी ने संतान प्राप्ति के अपने आपसी वैवाहिक निर्णय के तहत पति के शुक्राणु निकालने और संरक्षित करने की अनुमति मांगी। उन्होंने बताया कि उनके पति वर्तमान में चिकित्सकीय रूप से अक्षम हैं और आईवीएफ प्रक्रिया में भाग लेने के लिए लिखित सहमति देने में असमर्थ हैं। यह भी कहा गया कि उनके पति के कोमा जैसी स्थिति से उबरने की कोई संभावना नहीं है।
भारत सरकार ने नहीं दी सहमति
भारत सरकार ने पत्नी की याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि पति ने एआरटी अधिनियम की धारा 22 के तहत शुक्राणु लेने के लिए स्पष्ट सहमति नहीं दी है।
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FAQs
अनुच्छेद 21 तहत मौलिक प्रजनन अधिकार
इसके बाद पत्नी ने सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2022 (एआरटी अधिनियम) के प्रावधानों और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत अपने मौलिक प्रजनन अधिकार का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
