Bhojshala: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार का धार का दौरा किया। वहीं उन्होंने ऐतिहासिक भोजशाला में मां वाग्देवी (मां सरस्वती) के पूजा-अर्चना की। उन्होंने कहा कि कोर्ट का जो फैसला आया वो सौभाग्य की बात है। इससे पहले शुक्रवार को मां वाग्देवी (देवी सरस्वती) की आरती और विशेष पूजन हुआ। बता दें कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने 15 मई को फैसला सुनाया। कोर्ट ने ASI के साक्ष्यों का हवाला देते हुए भोजशाल परिसर को मंदिर बताया।
साथ ही कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को वहां नमाज की अनुमति देने वाले 2003 के आदेश को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मुस्लिम पक्ष यदि चाहे तो वह सरकार से धार में ही किसी दूसरी जगह जमीन की मांग कर सकता है। कोर्ट ने हिंदुओं को वहां पूजा-पाठ करने का अधिकार भी दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हमने यह पाया है कि यहां स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई।
मुस्लिम पक्ष ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
इस मामले में मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह याचिका मस्जिद कमेटी की ओर से दाखिल की गई है। मुस्लिम पक्ष (Bhojshala case) का कहना है कि हाई कोर्ट का 15 मई का आदेश सही नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
भोजशाला को लेकर ASI ने क्या कहा?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की 2000 पन्नों की रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया, जिसमें कहा गया था कि मौजूदा ढांचा पुराने मंदिर के अवशेषों पर आधारित है। यह रिपोर्ट 98 दिनों की जांच के बाद तैयार की गई थी। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि मुस्लिम पक्ष चाहें तो धार जिले में अलग जमीन लेकर मस्जिद का निर्माण कर सकता है। इस फैसले के बाद विवाद और गहरा गया है और मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ASI की रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं है और जांच प्रक्रिया में कई खामियां हैं।
कौन हैं 'वाग्देवी'?
मां वाग्देवी सनातन धर्म में विद्या, बुद्धि, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का ही दूसरा अत्यंत पवित्र नाम हैं। 'वाग्देवी' शब्द दो शब्दों 'वाक्' (वाणी या शब्द) और 'देवी' (दिव्य शक्ति) से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'वाणी और ज्ञान की देवी' होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे मनुष्य को ज्ञान, विवेक, सुंदर अभिव्यक्ति और रचनात्मक शक्ति प्रदान करती हैं, जिसके कारण विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, संगीतकार और विद्वान विशेष रूप से उनकी आराधना करते हैं। मां वाग्देवी को उनके दिव्य गुणों के कारण सरस्वती, शारदा, भारती और वागीश्वरी जैसे कई अन्य आदरणीय नामों से भी जाना जाता है।
क्या है भोजशाला का इतिहास?
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस परिसर का निर्माण 11वीं सदी (लगभग 1034 ईस्वी) में मालवा के परमार वंश के राजा भोज ने करवाया था, जो कला और शिक्षा के बड़े संरक्षक थे। हिंदू मान्यता के अनुसार, राजा भोज ने इसे एक प्रमुख विश्वविद्यालय और मां सरस्वती के मंदिर के रूप में स्थापित किया था, जिसे 'भोजशाला' कहा गया।
बाद में 14वीं और 15वीं सदी के दौरान अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान जैसे शासकों के काल में इस परिसर के कुछ हिस्सों को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया, जिसे मुस्लिम समाज 'कमाल मौलाना की मस्जिद' के रूप में पूजता है। इस परिसर की दीवारों और खंभों पर आज भी संस्कृत के श्लोक और हिंदू धर्म से जुड़े नक्काशीदार चिह्न देखे जा सकते हैं।
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