इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पूर्व नेता मोहम्मद गाजी को एक आपराधिक मामले में बड़ी राहत दी है। अदालत ने बिजनौर जिले के शेरकोट थाने में दर्ज एक मामले के सिलसिले में मोहम्मद गाजी की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही, अदालत ने मामले के जांच अधिकारी को आगामी 60 दिनों के भीतर अपनी जांच पूरी करने का कड़ा निर्देश भी जारी किया है। यह आदेश शनिवार को न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने मोहम्मद गाजी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
BNS की कई गंभीर धाराओं में दर्ज है मामला
दरअसल, पूर्व बसपा नेता मोहम्मद गाजी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने खिलाफ शेरकोट थाने में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। यह FIR इसी साल 27 अप्रैल 2026 को अपराध संख्या 74/2026 के रूप में दर्ज की गई थी।
इस मामले में मोहम्मद गाजी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है, जिसमें मुख्य रूप से धारा 318(4) (धोखाधड़ी/बेईमानी से संपत्ति सुपुर्द करने के लिए उकसाना), धारा 338, 336(3), 340(2) (जालसाजी और दस्तावेज संबंधी अपराध), धारा 61(1) (आपराधिक साजिश), धारा 352, 351(2), और 109(1) (आपराधिक धमकी और उकसाना) के तहत मामले दर्ज थे।
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'शोभित नेहरा' मामले की नजीर पर आया फैसला
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनने और मामले के रिकॉर्ड का गहन परीक्षण करने के बाद अपना फैसला सुनाया। खंडपीठ ने 'शोभित नेहरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में स्थापित कानूनी नजीर को ध्यान में रखते हुए इस मामले का निपटारा किया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि चूंकि इस मामले की जांच अभी शुरुआती चरण में है, इसलिए इसे रद्द नहीं किया जा सकता, लेकिन जांच को लटकाया भी नहीं जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया कि पुलिस इस जांच को हर हाल में 60 दिनों के भीतर तार्किक अंजाम तक पहुंचाए।
गिरफ्तारी पर रोक, लेकिन माननी होगी यह शर्त
हाईकोर्ट ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट किया है कि जब तक पुलिस इस मामले की अंतिम रिपोर्ट संबंधित अदालत के समक्ष पेश नहीं कर देती और अदालत उस पर संज्ञान नहीं ले लेती, तब तक मोहम्मद गाजी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
याचिकाकर्ता मोहम्मद गाजी को मिली यह अंतरिम राहत पूरी तरह से इस शर्त पर निर्भर है कि वे पुलिस जांच में पूरा सहयोग करेंगे। यदि जांच अधिकारी को लगता है कि याचिकाकर्ता जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं या टालमटोल कर रहे हैं, तो प्रशासन को यह पूरी छूट होगी कि वह इस अंतरिम सुरक्षा को वापस लेने के लिए दोबारा हाईकोर्ट का रुख कर सकता है। इस आदेश के बाद पूर्व बसपा नेता को कानूनी तौर पर बड़ी राहत मिल गई है, वहीं बिजनौर पुलिस को अब दो महीने के भीतर अपनी चार्जशीट दाखिल करनी होगी।
