भोपाल

गणेश चतुर्थी बना सद्भावना की मिसाल, रतलाम की जेल में मुस्लिम कैदी भी बना रहे भव्य गणेश प्रतिमाएं

मध्य प्रदेश में रतलाम के सर्किल जेल में बंदियों द्वारा बनाई जा रही गणपति की मूर्तियां चर्चा में है। खास बात यह है कि इन मूर्तियों को गढ़ने में कुछ मुस्लिम बंदी भी है जो गणपति की बेहद आकर्षक और सुंदर प्रतिमा बना रहे हैं।

Image

रतलाम सर्किल जेल में ेबंदी सलमान जो गणपति की मूर्ति बनाता है (PHOTO- टाइम्स नाउ नवभारत)

रतलाम: 27 अगस्त यानी आज से गणपति बप्पा के उत्सव का आगाज हो गया है। इस बीच देश के कई हिस्सों में स्थित भव्य पंडालों और गणपति की मूर्तियों की जहां चर्चा हो रही है उसमें मध्य प्रदेश के रतलाम के सर्किल जेल के कैदियों द्वारा बनाई जा रही गणपति मूर्तियों की भी चर्चा है।

रतलाम की सर्किल जेल में बंदियों द्वारा पिछले 25 दिनों से गणेश मूर्तियां बनकर तैयार की जा रही है । मूर्तियां बेहद सुंदर और आकर्षक है जिसकी सभी लोग सराहना कर रहे हैं। सर्किल जेल के इन बंदियों की बनाई गई मूर्तियों को घर ले जाकर लोगों लोग स्थापित कर विधिवत पूजा अर्चना भी कर रहे हैं।

रतलाम की सर्किल जेल के जेलर ने बताया कि जिला सर्किल जेल में बंद बंदियों द्वारा पिछले 25 दिनों से गणेश मूर्तियां बनाई गई हैं । इनमें मुस्लिम बंदियों द्वारा भी कई गणेश जी की मूर्तियां बनाई गई हैं और मुस्लिम बंदियों की आस्था भी गणेश मूर्तियां बनाने में दिखाई दी। सर्किल जेल में बंद बंदी सलमान ने कई सुंदर गणेश मूर्तियां बनाई हैं ।

सलमान ने बातचीत में बताया कि पिछले दिन सालों से रतलाम की सर्किल जेल में बंदियों द्वारा गणेश मूर्तियां बनाई जा रही हैं जो इस वर्ष भी बनाई गई हैं। हम लोग पिछले 25 दिनों से गणेश जी की मूर्तियां बना रहे हैं। जेल प्रशासन द्वारा दो बार हमे गणेश मूर्तियां बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी और अब इस जेल के बंदी गणपति की सुंदर मूर्तियों को गढ़ रहे हैं।

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

और पढ़ें
End of Article