जब भी बाद सबसे बड़े धनुर्धर की आती है तो अर्जुन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। लेकिन अर्जुन के साथ ही कर्ण और एकलव्य के नाम भी आते हैं। एकलव्य ने गुरु दक्षिणा में अपने दाहिने हाथ का अंगूठा दे दिया और कर्ण को गुरु से झूठ बोलने पर श्राप मिला।
एकलव्य का चरित्र अथक श्रम और कठोर आत्मअनुशासन का उदाहरण है। जंगल में अकेले रहकर, बिना किसी मार्गदर्शन के, उसने धनुर्विद्या में दक्षता प्राप्त की। उसका जीवन बताता है कि परिस्थितियां प्रतिकूल हों, तब भी लक्ष्य के प्रति समर्पण सफलता का रास्ता तय करता है।
आज भी निषाद, भील और आदिवासी समाज एकलव्य को अपना आदर्श पुरुष मानते हैं। वह उनके आत्मसम्मान, संघर्ष और क्षमता का प्रतीक है। सदियों बाद भी वनवासी समाज द्वारा उसकी पूजा और मंदिरों का निर्माण इस बात का प्रतीक है कि एकलव्य सिर्फ पात्र नहीं, सांस्कृतिक चेतना है।
एकलव्य महाभारत का सर्वाधिक विरोधाभासी चरित्र माना जाता है। वह नायक भी है और व्यवस्था का शिकार भी। उसका जन्म और मृत्यु अस्पष्ट हैं और अंत कथा पर ग्रंथ भी मौन हो जाता है। यही रहस्य उसे और ज्यादा रोचक बनाने के साथ ही विद्वानों के लिए निरंतर विमर्श का विषय बनता है।
अंगूठा दान: त्याग की पराकाष्ठागुरुदक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा देना एकलव्य के त्याग और आज्ञाकारिता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है। बिना किसी प्रश्न या शोक के यह बलिदान उसे अमर बना देता है। यह प्रसंग आज भी नैतिकता, सत्ता और प्रतिभा के संबंध पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
एकलव्य ने जिस जगह अपना अंगूठा दान किया था, अगर आज उस जगह को ढूंढें तो आपकी खोज दिल्ली के पास गुरुग्राम तक पहुंचेगी। गुरु द्रोण को समर्पित गुरुग्राम उस समय घना वन प्रदेश था।
अंगूठा कटने के बाद भी एकलव्य ने हार नहीं मानी। तर्जनी और मध्यमा से बाण चलाने की तकनीक अपनाकर उसने नई धनुर्विद्या का विकास किया। इस कारण उसे आधुनिक धनुर्विद्या का जनक माना जाता है, जो नवाचार और जिजीविषा का प्रतीक है।
हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित एकलव्य मंदिर उसकी कथा को भौगोलिक पहचान देता है। मान्यता है कि यहीं पर एकलव्य ने अंगूठा दान किया था। द्रोण को दान की गई भूमि से जुड़ा यह क्षेत्र गुरु-शिष्य परंपरा और त्याग की ऐतिहासिक स्मृति बन चुका है।