Allahabad High Court: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि दो अलग-अलग धर्मों के वयस्कों का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना किसी भी कानून के तहत अपराध नहीं है। न्यायालय ने सोनभद्र के एक अंतरधार्मिक जोड़े को सुरक्षा प्रदान करते हुए कहा कि संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद से जीने का अधिकार देता है और धर्म के आधार पर इसमें कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।
अंतरधार्मिक 'लिव-इन' न तो अवैध और न ही अपराध
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने सोनभद्र निवासी काजल और उनके मुस्लिम साथी की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की कि अंतरधार्मिक 'लिव-इन' न तो अवैध है और न ही अपराध। जोड़े ने अदालत से सुरक्षा की गुहार लगाई थी, क्योंकि उन्हें महिला के परिवार से लगातार धमकियां मिल रही थीं। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि स्थानीय पुलिस को शिकायत करने के बावजूद उन्हें कोई मदद नहीं मिली।
संविधान के दायरे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल अलग-अलग धर्मों से होने के कारण व्यक्तियों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सिंह ने कहा, "जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी कानून के तहत न तो प्रतिबंधित है और न ही दंडनीय।" अदालत ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव का निषेध) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा कि अंतरधार्मिक जोड़े का साथ रहना कोई अपराध नहीं है।
दो व्यक्तियों की स्वतंत्र इच्छा सर्वोपरि
18 मार्च को दिए गए इस आदेश में अदालत ने बेहद मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा, "यह न्यायालय अलग-अलग धर्मों के याचिकाकर्ताओं को 'हिंदू और मुस्लिम' के रूप में नहीं देखता, बल्कि दो वयस्क व्यक्तियों के रूप में देखता है जो अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से काफी समय से शांतिपूर्वक और खुशी-खुशी साथ रह रहे हैं।" अदालत ने आगे कहा कि किसी के व्यक्तिगत संबंधों में हस्तक्षेप करना उन दो व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार पर गंभीर अतिक्रमण होगा।
पुलिस को दिए सख्त निर्देश
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने अदालत को सूचित किया कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और उनके खिलाफ साथ रहने को लेकर कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं है। इसके बाद, उच्च न्यायालय ने पुलिस को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को कोई नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है, तो पुलिस कानून के अनुसार त्वरित कार्रवाई करे। अदालत ने पुलिस को याचिकाकर्ताओं की उम्र और मामले की गहराई से जांच करने के भी निर्देश दिए।
