Allahabad High Court NSA Quashed: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की छात्रा आकृति चौधरी (24) की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया है।
अप्रैल महीने में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े इस मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम और संबंधित पुलिस अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि निरंकुश अधिकारियों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो वे उत्तर प्रदेश को जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास की तरह 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' (Orwellian Dystopia - जहां नागरिकों की स्वतंत्रता छीन ली जाती है) में बदल देंगे।
₹5 लाख का हर्जाना और DM के वेतन से वसूली का निर्देश
अदालत ने माना कि आकृति चौधरी की लगातार हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
हर्जाना: हाई कोर्ट ने पीड़िता आकृति चौधरी को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
अधिकारियों की जवाबदेही: कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यह राशि राज्य के खजाने के बजाय गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम और प्राथमिक रिपोर्ट तैयार करने वाले एसएचओ (SHO) समेत अन्य जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल की जाए।
'हिंसा का कोई सबूत नहीं, केवल धारणाओं पर कार्रवाई'
आकृति चौधरी पर आरोप था कि उन्होंने अप्रैल में नोएडा में अधिक वेतन और मानवीय कार्य समय की मांग को लेकर हो रहे मजदूरों के आंदोलन में हिंसा भड़काने की साजिश रची थी।
व्हाट्सएप व वीडियो की जांच: जब राज्य सरकार से हिंसा भड़काने या आगजनी का आह्वान करने वाले व्हाट्सएप संदेश या वीडियो पेश करने को कहा गया, तो सरकारी पक्ष एक भी सबूत पेश नहीं कर सका।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन अधिकार: पीठ ने कहा कि वीडियो में केवल निहत्थे लोग अपने अधिकारों के लिए एकत्र दिख रहे हैं, जो संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
अदालत की टिप्पणी: 'NSA एक असाधारण कानून है, इसे सामान्य आपराधिक कानून के विकल्प के रूप में या केवल अनुमानों, पूर्वाग्रहों और राय के आधार पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।'
गिरफ्तारी की तारीखों में मिला बड़ा झोल
उच्च न्यायालय ने पुलिस द्वारा दिखाए गए गिरफ्तारी के समय और दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां पाईं:
गिरफ्तारी का सच: आकृति को 11 अप्रैल की शाम करीब 5:30 बजे बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से हिरासत में लिया गया था।
पुलिस की थ्योरी: पुलिस ने दावा किया कि गिरफ्तारी 12 अप्रैल को हुई थी।
फर्जी प्रक्रिया: पुलिस जिस नोटिस पर भरोसा कर रही थी, उस पर 12 अप्रैल की सुबह 10:20 बजे की जनरल डायरी (GD) प्रविष्टि दर्ज थी। कोर्ट ने इसे गिरफ्तारी के बाद तैयार किया गया फर्जीवाड़ा (ex-post facto) करार देते हुए पूरी प्रक्रिया को एक ढोंग बताया।
डीएम मेधा रूपम के फैसले की तीखी आलोचना करते हुए कोर्ट ने कहा कि बिना किसी आपराधिक इतिहास वाली छात्रा पर बिना सबूतों के इतना कड़ा कानून लगाना निंदा के योग्य है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि जिलाधिकारी ने जनता को डराने और भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करने से रोकने के लिए आकृति को 'नजीर' बनाने की कोशिश की।
बेंच ने याद दिलाया कि नौकरशाहों की वफादारी संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि राजनीतिक आकाओं के प्रति। अधिकारी जनता के सेवक हैं। अगर जो अधिकारी अपनी शपथ के खिलाफ काम करते हैं, उन्हें 'ब्रिटिश राज की दमनकारी निशानी' के तौर पर देखा जा सकता है, जिससे नागरिक अशांति का माहौल बन सकता है।
