Balkrishna Acquitted: देहरादून स्थित CBI की विशेष अदालत ने योग गुरु बाबा रामदेव के करीबी सहयोगी और पतंजलि योगपीठ के प्रबंध निदेशक एवं महासचिव आचार्य बालकृष्ण को 15 साल पुराने फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है। विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (CBI) की अदालत ने सोमवार (7 सितंबर) को यह फैसला सुनाते हुए बालकृष्ण के साथ-साथ सह-आरोपी नरेश चंद्र द्विवेदी को भी सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। नरेश चंद्र पर बालकृष्ण को कथित रूप से फर्जी दस्तावेज मुहैया कराने का आरोप था।
फैसले के बाद क्या बोले आचार्य बालकृष्ण?
अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि उनका देश की न्याय प्रणाली पर हमेशा से पूरा भरोसा रहा है। हालांकि, इतने सालों तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया पर दुख जताते हुए उन्होंने कहा कि इस लंबे मुकदमे ने उन्हें और उनके संस्थान को काफी मानसिक और सामाजिक नुकसान पहुंचाया। उन्होंने कहा, "मुझे देश की न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था और आज सत्य की जीत हुई है। लेकिन यह लंबी कानूनी प्रक्रिया बेहद थका देने वाली रही। इस दौरान मुझे अकारण ही अपमान, बदनामी और दूसरों की नकारात्मक ऊर्जा को सहन करना पड़ा।"
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2011 का है, जब केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए (UPA) सरकार के दौरान पतंजलि और बाबा रामदेव के आंदोलनों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज थीं। उसी समय सीबीआई ने एक शिकायत के आधार पर आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ मामला दर्ज किया था। शिकायत में दावा किया गया था कि आचार्य बालकृष्ण मूल रूप से नेपाल के नागरिक हैं और उन्होंने फर्जी शैक्षिक योग्यता (पूर्वांचल विश्वविद्यालय की डिग्री) व फर्जी पहचान पत्रों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट हासिल किया है।
सीबीआई ने बालकृष्ण पर धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने और पासपोर्ट अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। आरोप लगाया गया था कि पासपोर्ट आवेदन के साथ जमा किए गए संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रमाण पत्र और कुछ पहचान पत्र वास्तविक नहीं थे।
15 साल की लंबी सुनवाई और अदालत का निष्कर्ष
2011 में मामला दर्ज होने के बाद से यह केस देहरादून की विशेष सीबीआई अदालत में लंबित था। लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के बयानों के बाद, सीबीआई अदालत में बालकृष्ण के खिलाफ यह साबित करने में विफल रही कि दस्तावेज जानबूझकर फर्जी तरीके से बनवाए गए थे या वे नेपाली नागरिक होकर अवैध रूप से भारतीय नागरिकता का लाभ उठा रहे थे। अदालत ने सह-आरोपी नरेश चंद्र द्विवेदी को भी निर्दोष माना, जिन पर फर्जी डिग्री/कागजात बनवाने में मदद करने का आरोप लगाया गया था। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपियों को सभी आपराधिक धाराओं से पूरी तरह से बरी कर दिया।
मामले का राजनीतिक एंगल
साल 2011-12 के दौरान जब स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला मैदान में आंदोलन किया था, तब यह मामला बेहद सुर्खियों में रहा था। उस वक्त पतंजलि और आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ हुई इस कार्रवाई को पतंजलि समर्थकों ने राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया था, जबकि विरोधियों ने इसे गंभीर धोखाधड़ी का मामला बताया था। 15 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद आए इस फैसले से आचार्य बालकृष्ण और पतंजलि योगपीठ को एक बड़ी राहत मिली है और उनके खिलाफ लगे सभी पुराने आपराधिक आरोपों का पटाक्षेप हो गया है।
