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अमेरिका क्यों चाहता है जल्दी खत्म हो ईरान के साथ लड़ाई, पेंटागन ने बंद कमरे में बताई वजह

US-Isreal-Iran War को लेकर अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन ने कांग्रेस को वह वजह बतार्ह है, जिसके चलते अमेरिका जंग से फौरन बाहर निकलना चाहता है। बंद कमरे में हुई बैठक के आधार पर वॉशिंगटन पोस्ट, ABC सहित तमाम बड़े अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

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अमेरिका को हर दिन भारी पड़ रहा युद्ध

US-Israel-Iran War: अमेरिका और इजरायल की ईरान के खिलाफ चल रही जंग को लेकर ट्रंप अपने घर में घिरते जा रहे हैं। अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन में बंद कमरों में ट्रंप प्रशासन कांग्रेस सदस्यों और सीनेटरों को बता रहे हैं कि असल में खाड़ी में क्या दांव पर लगा है और क्यों अब ट्रंप बार-बार जंग खत्म करने की बात कर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अमेरिका के लिए यह जंग बेहद महंगी साबित हो रही है। न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर वाशिंगटन पोस्ट और ABC News जैसे तमाम बड़े अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पेंटागन ने अमेरिकी सांसदों को बंद कमरे में बताया कि युद्ध के पहले 6 दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। बढ़ती लागत और हथियारों के दबाव ने वॉशिंगटन की चिंता बढ़ा दी है।

6 दिन में 11.3 अरब डॉलर खर्च

ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन ने कांग्रेस के सांसदों को एक बंद कमरे की ब्रीफिंग में चौंकाने वाला आंकड़ा बताया। अधिकारियों ने कहा कि जंग के पहले छह दिनों में ही अमेरिका को करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च करने पड़े। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह रकम केवल शुरुआती सैन्य अभियानों की है और इसमें कई अन्य परिचालन खर्च पूरी तरह शामिल भी नहीं हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस कून्स ने भी माना कि सार्वजनिक रूप से सामने आया यह आंकड़ा लगभग सही है और वास्तविक लागत इससे कहीं ज्यादा हो सकती है।

हर बढ़ रहा आर्थिक बोझ

सांसदों को दी गई जानकारी के मुताबिक युद्ध की दैनिक लागत बेहद तेजी से बढ़ रही है। कुछ सांसदों का अनुमान है कि अभियान का खर्च हर दिन 1.5 अरब डॉलर से ज्यादा तक पहुंच सकता है। यह पैसा फिलहाल पेंटागन के उस बजट से खर्च किया जा रहा है जिसे पहले से कांग्रेस ने मंजूरी दी थी। हालांकि अभी तक व्हाइट हाउस ने इस युद्ध के लिए अतिरिक्त बजट की औपचारिक मांग नहीं की है, लेकिन भविष्य में बड़े फंड की जरूरत पड़ सकती है।

महंगे हथियारों ने बढ़ाई लागत

विश्लेषकों के अनुसार युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए अत्याधुनिक और बेहद महंगे हथियारों का इस्तेमाल किया। लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें, प्रिसिजन मुनिशन और एडवांस्ड एयर डिफेंस इंटरसेप्टर बड़ी मात्रा में इस्तेमाल किए गए। रिपोर्टों के मुताबिक केवल पहले वीकेंड में ही अमेरिका ने लगभग 5 अरब डॉलर मूल्य के मुनिशन इस्तेमाल किए। एक टॉमहॉक मिसाइल की कीमत करीब 36 लाख डॉलर होती है, जबकि JDAM जैसे गाइडेड बम लगभग 80 हजार डॉलर के आसपास पड़ते हैं। इस तरह शुरुआती हमलों में इस्तेमाल हुए महंगे हथियारों ने लागत को तेजी से बढ़ा दिया।

नौसैनिक तैनाती का भारी खर्च

ईरान की जवाबी मिसाइल और ड्रोन हमलों से अमेरिकी ठिकानों और सहयोगियों की रक्षा के लिए अमेरिका को पैट्रियट और THAAD जैसे अत्याधुनिक इंटरसेप्टर सिस्टम भी तैनात करने पड़े। रिपोर्टों के अनुसार केवल पहले 100 घंटों में ही इन डिफेंस सिस्टम्स के इस्तेमाल पर 1.6 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो गया। इसके अलावा मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी नौसैनिक बेड़े के संचालन पर भी रोजाना करोड़ों डॉलर खर्च हो रहे हैं।

हथियारों के भंडार पर दबाव

तेजी से खर्च हो रहे प्रिसिजन हथियारों को लेकर अमेरिकी रणनीतिक विशेषज्ञ भी चिंता जता रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार पेंटागन को अपने कुछ एयर डिफेंस सिस्टम और हथियार भंडार एशिया-प्रशांत क्षेत्र से मध्य पूर्व की ओर स्थानांतरित करने पड़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो इससे अमेरिका की अन्य क्षेत्रों में सैन्य तैयारी और रणनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

कई गुना बढ़ सकती है लागत

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी युद्ध की शुरुआती लागत अक्सर कम आंकी जाती है। इराक और अफगानिस्तान युद्ध के शुरुआती अनुमान भी अपेक्षाकृत कम थे, लेकिन बाद में उनका कुल खर्च 8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। इसी वजह से अमेरिकी नीति निर्माताओं के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि यदि ईरान के साथ संघर्ष लंबा चला तो इसकी आर्थिक और सैन्य लागत बेहद भारी हो सकती है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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