हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) को आर्थिक सुरक्षा का सबसे जरूरी हिस्सा माना जाना चाहिए। बढ़ते मेडिकल खर्चों और महंगे हॉस्पिटल बिल के बीच ज्यादातर लोग हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदना जरूरी भी समझते हैं। लेकिन प्रीमियम बचाने के लिए सस्ते हेल्थ इंश्योरेंस प्लान को चुन लेते हैं। शुरुआत में ये प्लान किफायती लग सकते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर अक्सर यही प्लान बेकार साबित हो सकता है। खासकर बड़े इलाज या लंबे समय तक हॉस्पिटल में भर्ती रहते हुए एक भारी आर्थिक बोझ झेलना पड़ सकता है।
क्यों बेकार होते हैं सस्ते प्लान
सस्ते प्लान में अक्सर Room rent limit, disease sub-limits और co-payment जैसी कंडीशन होती हैं। इसका मतलब यह है कि हॉस्पिटल बिल का बड़ा हिस्सा पॉलिसी होल्डर को अपनी जेब से देना पड़ सकता है।

Health Insurance (Photo: iStock)
उदाहरण के तौर पर अगर किसी पॉलिसी में रूम रेंट लिमिट 5,000 रुपये प्रतिदिन तय है, लेकिन इंश्योर्ड व्यक्ति 10,000 रुपये प्रतिदिन वाले रूम में एडमिट होता है तो बाकी खर्च Proportional deduction के जरिए ग्राहक पर आ सकता है। इसी तरह कुछ पॉलिसी स्पेसिफिक ट्रीटमेंट पर खर्च की लिमिट तय कर देती हैं, जिससे बिल का पूरा रिम्बर्समेंट नहीं मिल पाता।
इसके अलावा, सस्ते प्लान्स में कई बार वेटिंग पीरियड भी ज्यादा होता है। कुछ बीमारियों के लिए 2 से 4 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है। वहीं कई पॉलिसी पहले से चली आ रही बीमारी को तुरंत कवर नहीं करतीं। इमरजेंसी की स्थिति में ऐसी शर्तें बड़ी परेशानी बन सकती हैं।
बेसिक कवर लेना काफी नहीं
एक्सपर्ट्स का कहना है कि मेडिकल इंफ्लेशन भारत में तेजी से बढ़ रही है। कई प्राइवेट हॉस्पिटल में ICU charges, medicines, diagnostics और surgeries की लागत हर साल बढ़ती जा रही है। ऐसे में 3-5 लाख रुपये का बेसिक कवर भविष्य में पर्याप्त नहीं रह सकता। खासकर मेट्रो सिटी में सीरियर इलनेस का ट्रीटमेंट आसानी से 10-20 लाख रुपये तक पहुंच सकता है।
हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज रिव्यू करना जरूरी
यंग एज में लोग अक्सर लो-कॉस्ट पॉलिसी खरीद लेते हैं और लंबे समय तक उसी कवरेज को जारी रखते हैं। लेकिन उम्र बढ़ने और मेडिकल कॉस्ट बढ़ने के साथ वही कवर बेकार साबित हो सकता है। आपके साथ ऐसा न हो इसके लिए समय-समय पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज रिव्यू करते रहें।
एम्प्लॉयर-प्रोवाइडेड हेल्थ इंश्योरेंस भी काफी नहीं
ध्यान दें, केवल एम्प्लॉयर-प्रोवाइडेड हेल्थ इंश्योरेंस पर निर्भर रहना भी जोखिम भरा हो सकता है। नौकरी बदलने, ले ऑफ या रिटायरमेंट के बाद कवरेज खत्म हो सकता है। इसलिए व्यक्तिगत हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी रखना जरूरी माना जाता है।
प्रीमियम के अलावा और क्या रखें ध्यान
फाइनेंशियल एडवाइजर सलाह देते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय केवल प्रीमियम को ही ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए। प्रीमियम के अलावा, sum insured, hospital network, claim settlement ratio और policy conditions को भी ध्यान से समझना चाहिए। इंफ्लेशन को देखते हुए सुपर-टॉप-अप प्लान लेने का भी विचार बना सकते हैं, ताकि कम प्रीमियम में ज्यादा कवरेज मिल सके।
यहां आपको समझने की जरूरत है कि कभी भी कहीं भी मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में केवल सस्ता इंश्योरेंस प्लान लेना भविष्य में आपके लिए एक बड़ी आर्थिक परेशानी को दूर करने में मददगार साबित नहीं हो सकता है। एक्सपर्ट्स मानते हैं को हेल्थ इंश्योरेंस को एक खर्च नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल प्रोटेक्शन टूल के रूप में देखना चाहिए।
